Sunday, March 15, 2020

कैनवास - short story




सबका मन रखना बेशक काफी कठिन हो ,,   पर जो मन से  , पहले ही उलझा हो,  शायद उसके लिए कहीं और मन लगा लेना जरुरी हो जाता है।  शीतल,        मेरी शीतल बिलकुल उस छवि की तरह थी जो मैंने अपने मन में बना रखी थी , और उससे भी ज्यादा अपने नाम की तरह ,, अभी भी मंद मंद सी मुस्कान छोड़  जाती है मेरे ऊपर वो और इन सबसे थोड़ा भी कहीं ध्यान भटके तो उसका वो अपने कैनवास पे डूब  जाना ,  मुझे और भी आकर्षित करता था।
                                                                                                                                                           ज्यादा बातें  नहीं हो पायी जब हम पहली बार मिले थे जब  मेरे बड़ी  मम्मी  ने मेरे पापा को मेरे रिश्ते के लिए शीतल का नाम बताया था ,,और अब उसके संस्मरण में कहने को जैसे लफ्ज़ ही खत्म  नहीं होते  जहां  सबसे पहले उसके दिखाए  पेंटिंग्स  ही याद  आते है

 पता नहीं कब घर के  सारे  काम भी निपटा लेती और मैं जब भी ऑफिस से आता तो हर दिन उसकी नई नई पेंटिंग्स देखता। अपने रंगो के  साथ कैनवास पे कैसे खिल जाती तो कभी उसमे खुद को लिख जाती कुछ चीजे थी  जो ना उसकी बातो से और ना ही उसके मीठे स्वभाव से पता चलता था   पर अहसास। ........ अपनों के किसी खुशी के हो या दर्द के छुपाये कभी छुपते कहाँ हैं मेरी कोशिशे  रहती उसे अपने उस छवि  जैसा ही पाउ जैसे कुछ प्यारे से संझो के रखे थे मैंने शायद अपने लिए ,,,,,

रोज  के ऑफिस के काम कर  जब मै घर पहुँचता सोचकर की आज कुछ उमड़े जज्बात मुझमे कुछ सालो से उन्हें , शीतल से कहकर  थोड़ा बिखेर दूँ      कुछ वक़्त साथ बिता लूं।      ऐसा एक दो दफे ही हुआ जब वो साथ चलने को तैयार होती थी बाकि उसकी कोई ज्यादा ख्वाहिशें ही नहीं रहती थी।                                               किसी चीज़ पर उसका मोह नहीं था जैसे कपडे ,जेवर ,गहने को लेकर पूछने पर भी कोई रूचि नहीं दिखती थी , वो बस  धीरे  से कहती की पेंट ब्रश पुरानी हो गई है या कैनवास के पेपर नहीं है। एक कलाकार के तरह धीरे धीरे मै  भी जानकर हो गया था , इनसब मामले में मैंने कभी रोका नहीं उसे , कोसिस की एक बार   उस वक़्त तो जैसे घर का माहौल ही शांत  सा हो गया मै समझने लगा उसके कैनवास या कलाकृति कहो घर जबरदस्त खुशियों के होने का अहसास कराते थे और मेरे लिए तो सिर्फ शीतल की खुशियां मायने रख रही थी।

 उसे सुलझा हुवा समझने में मैंने ही जल्दबाजी कर दी , कहर था ही उसके इस जूनून का उसके बनाये हुए, कुछ पेंटिंग्स देख उदासी सी महसूस होती थी , और कभी कभी खुद मेरी शीतल भी, शादी के दो साल बाद भी मै  असफल कोशिसों से  शीतल को समझ रहा था , पर  लगता था यह शुरुआत है , उसकी वो धीमी सी मुस्कुराहट में मुझे वो तस्सली या राहत  दे जाती थी शायद खुद को या फिर मुझे ?
 ये दिखाने  की सब सही तो चल रहा है।
कुछ टूटी पंख के तितलियाँ या फिर सुनहरे धुप की सुन्दर किरणें  जो पानियों पर पड़  रहे थे ,ऐसे देर तक निहारते उसके पेंटिंग्स समझने की नाकामयाब कोसिस करता , लगता जैसे उनमे उसकी  बाते होती थी ,  कई बार कहा...  वो मुझसे बातें कर सकती है , दिल हल्का कर  सकती है , वो कहती की , मै  खुश हूँ  ऐसी कोई बात नहीं है  अब उसकी रंगों से उसे परखता था क्योंकि  वो बातें तो वंही करती थी ,मैंने इस बार पेंटिंग्स नहीं उसकी बीती जिंदगी पर गौर किया।

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शायद कुछ परवाह प्यार उसके बचपन के चंचल मन में घर नहीं बना पाये , बिना माँ बाप के और रिश्तेदारों  के अलगाव व भेदभाव ही मिले , मै  समझाता तो भी वो इस लगाव  महकमे से दूर ही रहने की कोशीश  करती थी ,
ऐसा होना उसका जरुरी था शायद , मै उसे उसके रंगो को कभी समझ नहीं पाता  , मै  ये भी कभी नहीं समझ पाता  की कुछ दंश लोगो को इस तरह से बदल देते है , शीतल ने अपना प्यार दुःख हसी अपने सारे भावनाये कैनवास पर उड़ेल रखे थे। जिन्हे मैं  अपना बनाना चाहता था

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