Sunday, March 15, 2020

नाकाम कोशिश - a short story





अरे समझ नहीं आता क्या तुम्हे ? मैं आ जाऊंगा नाह ,,     बस मन हुआ तो मैं आ गया  यहाँ    ,  और क्या गलत कर दिया बोलो तुम्ही     ,,, तुम जाती हो नाह मायके ,बार बार अपने सहेलियों से मिलने ,,यार दोस्त है मेरे यहाँ  मैं आ गया इनसे  मिलने    ,,, दिक्कत क्या है , खाना खाने दो मुझे कबसे आके बैठा हु यहाँ पर कुछ खाया नहीं हु , इनकी गलती नहीं है मैं  खुद ही इनके साथ आया हूँ  ,

                                                  बस  यही बात फ़ोन पर चल रही थी जिसमे से कुछ लाइन्स बार बार दोहराई जा रही थी  ,   निखिल  अपने फ़ोन में अपने पत्नी से बात कर रहा था , हम होटल पर बैठे थे नाश्ता करने को , उसकी पत्नी को उसने शायद पूरी बात नहीं बताई थी , मैं और राजीव  नाश्ता करते हुए उसकी बाते सुन रहे थे धीरे धीरे हसने भी लगे थे क्यूंकि निखिल  की आवाज अब होटल में बैठे सभी सुन रहे थे ,  निखिल की बातो को कहूं या उसके झगड़ो को सुन कर यह अंदाज़ा लगा सकता था की उस तरफ से क्या बात पूछी जा रही थी  , खैर यह तो जितनो  ने भी सुना सब समझ गए थे , छोटे से होटल हमें घूमते घूमते हुए मिली जहा सब लड़के  हमारे ही उम्र के थे और कुछ बुजुर्ग , उन्होंने सुना पर किसी ने इस तरह  ध्यान नहीं दिए की वो सच में रुचि रखते हो इन बातो में ,
                                                 हाँ कुछ एक दो महिलाये थी जिनके चेहरे पर मैं कुछ जानने   की उत्सुकता को देख सकता था , हाहा  वैसे  घूमने जाने का प्लान मेरे  अकेले का था जिस शहर में मैं नया था और अपने ही ऑफिस के दोस्त राजीव के साथ आया हुआ था राजिव से मेरी मुलाकात ऑफिस में ही हुई हम दोनों बहुत कम समय में जल्दी ही अच्छे दोस्त बन गए ,  पर निखिल मेरे छोटे भाई की तरह था जिसका फ़ोन मुझे मेरे किराये के घर से निकलते हुए आया था की वह मेरे पास आरहा है , और मैं ठहरा साथ की तलाश में , मैं कभी भी निखिल को मना नहीं कर सकता था , बेपरवाह ही सही उसमे तो मेरी जान बसती  थी ,हम दोनों ने कॉलेज साथ में किया और फिर कुछ जॉब्स भी , मेरी शादी उससे पहले हुई।   , वो छोटा सा प्लान हमारे घूमने जाने का ,हम तीनो एक साथ अपने अपने घर से निकले हुए थे , एक दो शहर  में कॉन्क्रीट बिल्डिंग देख कर ,दिन भर गाड़ी चलाते थके  हुए , आज की सुबह हमने किसी प्राकृतिक जगह में समय बिताने का सोचा था , और जब दोस्त साथ हो तो सफर का मजा दोगुना था , हमें भूख का पता चला तो हम होटल्स ढूढ़ने लगे , खाना तो कुछ हैवी था पर हम जहा थे वह जगह छोटी छोटी दुकानों से भरा हुआ था , अब समोसे से ही काम चलाने में हमने देरी नहीं की , बैठ गए जाके टेबल पर ,
                                                       , नाश्ता खत्म हुआ भी नहीं था राजीव मेरे बगल में ही बैठा हुआ था  और एक तरफ निखिल की फ़ोन पर बातें राजिव और मैंने आँखों के इशारे में ही सोच लिया समोसे पर ध्यान दिया जाए ,और हम खाने के मजे लेने लगे ,,सामने रोड जिस पर आने जाने वाली गाड़ियां व्यस्त थी ,,एकाएक मेरे दिमाग में  कुछ चीजे दौड़ने लगी जो काफी हद तक आज के जैसी ही थी मैंने महसूस किया निखिल को अपने बीते हुए उस दिन में जहा कभी मैं खुद हुआ करता था  ,
                         चहल पहल के इस अंतराल में मेरा ध्यान नाश्ते से ही हट गया ,   बस निखिल की बातो को सुन कर मुझे भी कुछ याद आने लगा  मुझे कुछ मेरे अतीत में खींचने लगा , मुझे भी मेरी पत्नी वत्सला  की ऐसे बाते याद आगयी जो वो मुझसे कहा करती थी , मुझे हर वक़्त पूछना की मैं कहा हूँ किसके साथ हु यहाँ तक की मेरे ऑफिस में होने के बाद भी पता नहीं उसे चैन नहीं होता था ,मुझसे भी बाते किया करो ,मैं तुमसे कौन सा पूरा  वक़्त मांगती हूँ  , और मैं  जवाब देता था बहुत कम  भीड़भाड़ जगह में तो मेरे मुँह से एक लफ़ज़ भी नहीं निकलते थे और यही बात वतस्ला को बिलकुल पसंद नहीं आती थी , उसे मई घर जाने के बाद अकेले में प्यार से उसके सारे सवालों को उसके सामने बिछाकर प्यार से पिरोता था ,, मुझे पसंद ही नहीं था  , ऑफिस में रह कर किसी से बात करना मम्मी पापा  क़ो यह बात पता थी की मैं चिढ जाता हूँ वो अक्सर मुझे ऐसी ही समय पे फ़ोन किया करते थे जब  मै  घर पर रहूं या ऑफिस के छुट्टी  के समय ,,

 उसका हर वक़त मुझसे मेरा वक़्त मांगना मुझे अजीब घुटन से भर देता था हम दोनों में मुहब्बत कितनी  थी ये तो नहीं पता , पर मैं उसे समझता था उसकी प्यारी सी टकरार वाली जिद्द पूरी करता था ,पूरी करते करते जिद्द उसकी उस से कब बेइन्तेहाँ मुहब्बत को मैं राजी हो चूका था  हमें शादी किये और एक दूसरे के इश्क़ में दुबे दो साल हो गए थे अब , शायद वत्सला का प्यार यही था ,,  अब उसके हर सवाल जो मुझे परेशान करती थी  , उसके सही और सीधे जवाब देता था , धीरे धीरे मेरे रूह ने भी गवाही दी की यह वत्सला ही तो है ,  जिसकी तलाश थी मुझे ,,,

उसने मुझे तर कर दिया था अपनी परवाह से ,   अपने बेपनाह मुहब्बत से ,,  या शायद उसे कभी मुझसे मुहब्बत ही नहीं रही , उसके तलाक के कारन को मैं  कभी  नहीं जानना चाहता था ,, और जो वक़्त हमने साथ बिताये  उसे भूलने की कोशिश में मैंने हर वो चीज की जो एक लड़का करता है शराब ,सिगरेट के नशे , जल्दी ही मुझे अहसास हुआ इन सब से कुछ नहीं होने वाला , वतस्ला की बातें , हर वक़्त मुझसे और बातें करने की कोशिश , उसका गुस्सा हो जाना , उसका मुझ पर प्यार बरसाना ,,साथ समय बिताना ,घूमना ,हसना ,उसका इठलाना ,मुझसे झगड़ा करना ,  मेरे बारे में हर चीज जानने को आतुर , मुझसे दूर हो जाने में उसके वो  आंसू हर चीज मुझे एक एक सेकंड में ख़त्म करने को तैयार बैठी होती थी , नशे से बोर हो कर मैंने सफर से खुद को तस्सल्ली और वतस्ला से गुमराह  करने की कोशिश की , , उससे जो लगाव था मेरा  वो मुझे ही अब नोच रहा था ,
     वो समय जब नाश्ता मेरे पेट को जरूर भर रहा था पर मन का वो भूख जो मैं उससे अलग होने के बाद भी ,अपना समय अपने हिसाब से बदल बदल कर खुद को व्यस्त रख कर भरने की कोशिश ,वो कोशिश आज फिर उसके यादो से ही मर गयी कहीं।                                    
    मेरी कोशिशे जगह बदलती रही और आदतें भी ,  हर वक़्त एक साथ को तरसता रहा मैं , दोस्त चुने और चुनते ही चला गया ,  हर वो चीज जो मुझे उसकी याद नहीं दिलाती और भुला दे कोई साथ ,अक्सर मैं वही ढूंढ़ता रहा , सोने से ज्यादा अब घूमना मेरे अंदर जगह ले रहा था ,  शहर बदलना और आज राजिव निखिल के साथ घूमने का प्लान ऐसे ही नहीं बना था यह भी उन में शामिल था जहा मैं दोस्तों के साथ हो कर उसे भूलने की कोशिश कर रहा था जो एक छोटे से वृतांत से नाकाम हो गयी।

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