एक अजीब सी ख़ामोशी के हर दिन पल्ले पड़ जाता हूँ
बेनकाब होते चेहरे ही नहीं ,उठते परदे से भी डर जाता हूँ .♡♡♥️
बड़ी मोहिनी है दुनिया के अदायगी की
नाकाम कोशिशे है तमाम
पर फिर मैं इन्ही में सिमट जाता हूँ ♡♡♥️
सिखाते है रोज यहां के लोग मुझे
जो खुद में है उसे मारना है कैसे♡♡♥️
और उसे , भीतर जगाये रखने के कवायद
में सहूलियत से बार बार बिखर जाता हूँ ♡♡♥️
बगावत नहीं उलटे रास्ते पे चलने के लिए
पर उन मशरूफियत पे उदास दिल देख बिलख जाता हूँ। ♡♡♥️
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