Saturday, March 21, 2020

पंछी बावरा रे




पंछी बावरा पहले फ़क़त से 
दिल लगाए रे 

टूटे जो पंख 
फिर इश्क़ से मोह हटाए रे 

पंछी बावरा आसमा पे पालक बिछाये रे 
निगाह पे है वो एक शिकार के 
ये उसे कौन बताये रे 

टूटे थे पंख फिर भी दिल उसका 
उड़ने को फड़फड़ाये रे 

रंगीन जमीं में उसके 
अब तो पांव भी थरथराये रे 

पढ़ लिया नील आसमान ने उसके तालाब को 
हवा से कह के 
पास उसके पैगाम एक भेजवाये रे 

हवा ने दरकार की 
पंखो में उसके सूफी भरी 

पंछी खैर बैठा था 
एक छोऱ पे 
धड़कन उसका भी चिल्लाये रे 

अब क्या 

लेकर इश्क़ आसमा में 
पंछी ने फैला दिए हवा में पंख 

देख ये मिजाज़ 
कायनात भी इठलाये रे 





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