Sunday, February 7, 2021

कुछ वक़्त के लिए धुन खाली रखा जाए

 


कुछ वक़्त के लिए धुन खाली रखा जाए 

ना किरदार हो ना कहानी 

किसी किरदार की 

ना ज़जबात हो 

ना मुखौटे किसी बात की 

कुछ वक़्त के लिए धुन संगीत की बस सुनी जाए 

महसूस की जाए

तरंगों की तरह 

वो जो दिखती है 

धुन सुनने से 

सिर्फ धुन सुनने से

जिसमे ना हो आवाज 

किसी विवाद की

किसी के बर्बाद की 

ना आबाद की ना जुमलों की 

कैद किसी आग की 

कुछ वक़्त के लिए

धुन वो जो वास्तव में संगीत है 

उन्हें खाली रखा जाए

ना जाज़बात के बोल

ना किरदार के ढोल

ना कहानी अनसुनी 

ना मुखौटे का शोर

Monday, January 18, 2021

जिसे होना था बेपरवाह वो बैराग हो चला

शिकार हो चला, बेकार हो चला 
जिसे होना था बेपरवाह वो बैराग हो चला 
अपनी चाह थी, चाह की वाहवाही थी 
वो जिम्मा उठाता तो खैरात हो चला 
अपनी आश थी वो बेगाना हो चला 

उम्र के दरवाजे में क्या बुनता ख्वाब 
बूना भी तो क्या देखा वो ख्वाब 
बेड़ीया कसी हुई थी 
वो अपने पांव तोड़ चला 

बिस्तर की सिलवटों तक सिमटता गया 
ठंड है मन में 
गरम खून बह चला 

नींद आती तो भी आती कैसे 
जड़े सी जमी थी कोने में इश्क़ 
पर अपने वो फैला के चला 

फरियाद लगाए क्या खुदा से भी अब 
जाने किस तस्वीरों में जिंदा है जिद्द 
खुद्दारी अपनी रखी पीठ में
ना मांगा दुआ 
बस अपनी धाक जमाते चला।

Are you one of the Clickbait people

Clickbait that all we know, how digital media use this form to gain more ttaffic,, by putting attractive and catchy themes or wallpaper image anything etc for in the front show.


And when you came to know,you get to know what you saw were actually only an image not reality.


Clickbait is not only working on media, like Facebook, YouTube,websites


This one is also same with people,

Ever came across people who is firstly nice, or very impressive or beautiful but when you slowly slowly came to know the dark reveal, the truth reveal that's is why people won't trust each other we all use clickbait for other people, the idea of get trust worthy is no longer ideal for anyone instead of to become more beautiful by outer is where we put our all efforts. 

Stay connected 

@waakifiyat 

Instagram/Facebook 

Friday, December 18, 2020

विकास की बात भी हमारी तस्वीरो से और पिछड़े हुए लोग में भी हमारी तस्वीर.

 

credit-fatemfiles.wordpress.com

जिनकी तस्वीरे से सजा है आज डिजिटल मीडिया से लेकर अख़बार और मैगज़ीन पुरे दुनिया में क्या उन्हें पसंद है कि कोई उनकी तस्वीर निकल ले उनके मर्जी के बिना, उनके इलाको में उनके घर में उनके दैनिक कार्य के बीच में क्या उन्हें पसंद हैकि कोई उनकी तस्वीर उनके काम करते वक़्त निकल ले.

भारत देश के हर राज्य अपने अलग प्रकार की संस्कृति के लिए काफी मशहूर है, चाहे वो मध्यप्रदेष हो राजस्थान हो या छत्तीसगढ़ का बस्तर, की अनूठी जाती और यहां के अंदरुनी इलाको के लोगो को खबर ही नहीं की उनकी तस्वीरो को कहा कहा और किन् अखबारों में लगाया जा रहा है, सोशल मीडिया पर उनकी तस्वीरो को फ़िल्टर लगा कर लाखों लाइक्स शेयर पाने वाले पेज एडमिन और वेबसाइट के मालिक का कभी उनके नाम तक उजागर कर पाये है

अगर बात मानविक तरीके से देखा जाए तो यह बात शायद किसी को नहीं पसंद आएगी की कोई घूमते हुए यह कोई दैनिक कृत्या करते उनकी तस्वीरें निकाले जाहिर सी बात है क्या आपको यह बात अच्छी लगेगी की आप अपने काम में व्यस्त है चाहे वो कोई भी काम हो और अचानक आपकी तस्वीरें ले ली जाती है, उसके बाद आपको पता हि नहीं चलता की आपकी तस्वीर किन अल्फाज़ो के ऊपर रख कर उनके विचारो को बेपर्दा कर  रही है, 38 साल की मेंती बाई जो नारायणपुर के पास गांव में सब्जी बेचकर अपना घर चलाती है उनका कहना है की बहार से आये लोग के लिए हम नए है, कुछ लोग पोज़ करने को कहते है, विकास की बात में हमारी तस्वीरो से और पिछड़े हुए लोग में भी हमारी तस्वीर, सरकार की बात ही छोड़ दीजिये, आम नागरिक जो ज्यादा दूर अंचल के नहीं होते वो भी हमारे साथ इस तरह का बर्ताव करते है,   कई बार हमारी बहु बेटियां गाँव के होने वाले किसी उत्सव में जाने से बचती है, अब क्यूंकि हमे मोबाइल का कुछ पता टीवी के बारे में ज्यादा रूचि रखते है तो क्या हमें एक सजाने के नाम मात्र की तरह कैसे व्यवहार कर सकता है,

हमारे देश में शुद्ध रचनात्मक गतिविधियों और निजता का उल्लंघन करने वाले कानून को अलग से भली भांति परिभाषित नहीं किया गया है। लेकिन यदि कोई व्‍यक्ति जानबूझकर अनैतिक तरीके से किसी की तस्‍वीर लेता है, तो उसे उत्‍पीड़न की श्रेणी में रखा जाएगा। किसी सार्वजनिक क्षेत्र में ली जाने वाली तस्‍वीर में अनजाने में आए लोगों की तस्‍वीर आपके लिए खतरा नहीं है किंतु यदि यही काम आप जानबूझकर करते हैं तो आपको कानून के कटघरे में खड़ा किया जा सकता है।

Thursday, November 26, 2020

मैं चूतियों का साथ निभाता चला गया

 


मैं चूतियों का साथ निभाता चला गया 

मैं चूतियों का साथ निभाता चला गया
फिक्र थी नहीं किसी को 


मैं फिक्र ऐसे ही उड़ाता चला गया
आबादियों का शौक था
मैं शौक अपने इश्क़ का दबाता चला गया

ज़ज़्बात बताना यहां फज़ुल था
सिद्दते परवाह जताना फज़ुल था

सिमट के अकेला मैं जश्न मनाता चला गया

जो था गैर उसे भी इंसान समझ लिया

इंसानियत जो भुला उसे भुलाता चला गया

आंसू से खेल कर हंस दिया जहां
लब पे अपने सितम छिपाता चला गया

मुकाम का नशा था, मकान धुंद थी
मैं काम के इशारे में सांस चलाता चला गया


remake version of " main jindagi ka sath nibhata chla gya" sung by Muhammed rafi and lyricist by - sahir ludhianvi. 

c@waakifiyat

अक्ष आलिंगन



आज कई दिनों बाद अपने बेटे से मिला लॉक डाउन के बाद मेरी टाइल्स की दूकान वैसे बंद थी और मैंने सोचा था की छोटा बेटा भी अगर घर आजाये तो बेहतर होगा मुझे उससे बातें करने का मौका मिलेगा, 

हमेशा से मैं चाहता था की ज्यादा से ज्यादा उनके साथ  समय बिताऊं , 

एक उम्र में उनकी माँ जब हम तीनो बाप बेटे को छोर कर गयी तो मैंने भी दोनों बच्चो की परवरिश में और ज्यादा ध्यान देना चालू कर दिया 

बड़े चाचा जी घर में एक लौते बुजुर्ग थे उन्होंने दूसरी शादी करने को कहा पर मन माना  नहीं मेरा, 

हालाँकि शादी मैं  करता भी कैसे, विशु और जिशान्त में अब मुझे परिवार समेटता हुआ बेहतर लगा। 

खैर , घर की जिम्मेदारी और अपने व्यापर में मशगूल होते होते मैंने बस जिम्मेदारियां साड़ी निभाई फिर भी जब बच्चे मुझ से अपनी बात नहीं कह पाते थे तो लगता था शायद अब भी मैंने कहीं कमी करदी हो, 

और एक बाप बनने के बाद सबसे ज्यादा इस चीज की खलिश मुझे अब कहीं और धकेल रही थी,

शायद यह हर किसी के साथ होता हो या ना होता हो

शायद हर आदमी मेरी तरह सोचता हो या ना हो पर मैंने अपने दोस्तों में भी यही देखा 

स्कूल टाइम से ही विशु काफी समझदार और सलीके से रहा करता था, बिलकुल अपनी माँ की तरह सुलझा हुआ 

और जिशान्त 

जिशान्त के बगावती तेवर देख कर मुझे अपनी बचपन याद आती थी 

वैसा ही झगड़ा वैसा ही गुस्सा वही बचकानी हरकत और बहुत सारे भावनाओ का छुपा कर रखना 

उसे संभालना मेरे बस में कबि नहीं रहा 

न की तब जब वो छोटा था 

ना अब 

उसकी जिद्द थी उसे अपने दोस्तों के साथ वाले कॉलेज में जाना है और वही बहार रहना है

मैंने कोई बहस नहीं की

जिशान्त को देख कर मैं खुद के स्वाभाव से भी रूबरू होने लगा था , 

जो मैं जो  था जो मैं  हूँ और जैसे मैं रहा करता था, अड़ियल सा 

पर इनदोनो की माँ थी जो मुझे जानती थी मुझे समझती थी और पता नहीं क्या जादू करके मुझे शांत कर  देती थी

पिताजी को रीना पसंद थी वो भी उन्हें माँ की तरह लगती उन्होंने पहले तो मना किआ पर उसके घर आने के बाद जैसे वो उसकी ही तारीफ़ करने में लग जाते थे 

कई बार जिशान्त को गोद में खिलते हुए वो मुझसे कहते 

ये तेरी तरह है और तुझसे भी ज्यादा परेशां करता है देखना एक दिन यह तुझे बताएगा की तुम है कितना परेशां करते थे 

और फिर रीना कहती - पिताजी आप टेंशन ना लो जिशान्त आपके बेटे जैसा ही है भले  अड़ियल पर मुहब्बत से भरा हुआ 


टेबल पर चाय ठंडी हो गयी इतने में विशु नाहा कर आया और बोलने लगा - पापा चलो 

हम दोनों जिशान्त को लेने गए उसके कॉलेज हॉस्टल 

विशु ने गाडी निकाली और मैं अब सोचने लगा था की पता नहीं जिशान्त क्या रियेक्ट करेगा 

हमारी दो साल से बात ही नहीं हुई विशु से जिशान्त की घंटो बात होती पर मुझसे वो हमेशा खफा सा रहता 

मेरी हर बात उसे ताना लगती 

जिद्द उसका देख कर अब मैं समझने लगा था आचरण तो मेरा भी वही था फिर पिताजी क्या करते थे उन्होने मुझे कैसे संभाला मैंने भी वही किया उसकी हर जिद्द पूरी की उसे रोकना टोकना बंद कर दिया 

और यही जगह मुझे लगता था की 

अपना अक्ष भले मजबूत हो या कमजोर जब तक उसे हम अपने पर होते नहीं देखते हम खुद को काफी उम्दा ही समझते है 

माँ ने संभाला क्यूंकि मैं उनका बेटा था वो समझाती दुलार से सहलाती रीना के आने के बाद वो मुझे और मेरे व्यवहार को बर्दाश्त करती 

और अब जब मैं  जिशान्त को देखता हूँ 

लगता है भगवान मुझे ही परोस दिया है मेरे लिए ताकि मुझे भी पता चले मैंने क्या किआ और मेरे साथ वालो को क्या तकलीफे हुई 


और जैसे मुझे प्यार से मनाया जाता था, समझाया जाता था मैं इतना जान गया था की जिशान्त को भी प्यार से समझाया  जा सकता है 


अचानक विशु ने गाडी रोकी और कहने लगा पापा आप याद कर रहे हो क्या जीशु को ?

मैंने बोला - हाँ बेटा, तुम्हारे जनरेशन में शायद ओपन उप होना इजी होगा बाकी लोगो से काश तुम अपने लोगो से ओपन उप हो पाते थोड़ा कोसिस कर पाते 

विशु ने कहा - पापा मैं समझता हूँ आपको, और मेरी आपकी बात अच्छी होती तो है जीशु को लेकर आप टेंशन मत लो वो भी आपसे बहुत प्यार करता है बस बोल नहीं पता एकदम आपकी ही तरह यही वो 

मैंने कोई जवाब नहीं दिया 


विशु की यह बात मुझे लगी, सायद जिस पर मैंने कबि ध्यान नहीं दिया और इतना बोलते हुए वो नाश्ता लेने चले गया 


अब मुझे लगने लगा था की शायद मुझे खुद पर थोड़े बदलाव करने होंगे 

मैं अब खुश था की मुझे कोई तो उपाय मिला 

विशु के साथ नाश्ता करने के बाद हम निकल पड़े और अब एक गहरी झपकी मार ली 


हॉस्टल में जाने से पहले मैं मुस्कुराया, 

हम रिसेप्शन ऑफिस के पास थे और विशु जिशान्त के साथ बैग पकड़ कर आ रहा था 

जिशान्त को देख कर मैंने हलकी सी होंठ फैला कर स्माइल दी 

हालाँकि मन तो कर रहा था ठहाके मार कर हसु 

उसका चेहरा, वो तेज़ आँखे और वही अड़ियल स्वाभाव दीखता  हुआ उसका चलन 


उसने मुझे देखा मेरे पैर छुए और गाड़ी की तरफ चला गया 

मुझे उसका यह व्यवहार अंदर से खा गया 


हमने हॉस्टल की रजिस्टर में sign किये और अब मुझे समझ आ गया  की अब भी जिशान्त  मुझसे गुस्सा है 


पुरे रास्ते मैंने सोचा बात करू उसका  हालचाल पुछु 

 

पर विशु ने हालत की डोर संभाली और मेरे हिस्से की उत्लाहट को कम कर दिआ 

उसने 

जीशु से एक एक करके सवाल पूछने चालू कर दिए 


कैसा चल रहा 

पढ़ाई 

दिवाली में क्यों नहीं आया 

फीस सही पे कर रहा की नहीं 

पैसे  कम तो नहीं पड़ते 

घर में सब तुझे याद करते है वगेरा वगेरा 


और इन सबका जवाब देता 

तो हल्कापन मुझे महसूस होता 

 

 

 



Wednesday, May 27, 2020

दिन की पहली कमाई






   सब्जी बेचने का काम तो मुझसे शायद कभी नहीं हो पायेगा, ठंडी में चाय और समोसे, 
बारिश के मौसम में घर पे थोड़े दिन की जिंदगी बसर हो जाती थी. और अब नया सामान बेचना जैसे नए धंदे में घुसना। सीतारिन बाई से तो हमेशा से मेरी झड़प ही हुई बाजार  को लेकर मेरा ठेला उसकी छोटी सी चौपाई अब मैं ठहरा बाहरी राज्य का और सीतारिन काकी मंझी हुई व्यापारी उनसे दुश्मनी भी नहीं कर सकता और ये कोई भी नहीं करता पुरे बाजार में ऐसी औरत जिसकी स्वाभिमान की चर्चा अपने चने के भाव कभी कम नहीं किये भले ग्राहक आये ना आये और व्यापार का पहला उसूल तो उसने बखूबी तोड़ के खुद के व्यापार को इतना बड़ा किया। 
मेरा वापस ओडिशा जाने का प्रबंध आखिर हो गया था बहुत मुश्किल के बाद, कितनी दौड़ भाग के बाद  अपने बड़े भैया के पास  जमापूंजी भेजवायी, 
वो तेलंगाना में फसे थे , हालाँकि फसा कोई नहीं था सब जीवन बसर करने के अपने मजदूरी तरीके से यहाँ वंहा राज्य में गए थे।  बड़े भैया का ओडिशा जाना बहुत  जरुरी था क्यूंकि लॉक डाउन में उन्होंने  पहले ही सारे पैसे माँ को भेजवा दिए थे।  कुछ महीने तो निकल ही गए पर भैया का घर जाने का जिद्द मुझसे देखा ना गया, 

हालात सच में बहुत ख़राब थी 

उनके कुछ दोस्त के रिश्तेदार घर जाते वक़्त ही भूख  और गर्मी में मारे गए ,  एक दोस्त ने आत्महत्या कर ली.
 
मजदुर शब्द पहली बार इतनी महीनो तक अखबारों में छपा रहा पहले भुगतान को तरसता मजदुर या काम या फिर आत्महत्या करते मजदूर 

इस बार नया था "प्रवासी मजदूर "

2009 में भैया तेलंगाना चले गए उन्हें गोदाम में  मजदूरी की काम मिली थी। ओडिशा में आये भूकंप से पिताजी की अपनी दूकान धवस्त हो गयी खबरों में छपा रहा की सरकार बाढ़ पीड़ितों को पैसे मकान दिलवाएगी '
  इंस्युरेन्स होने के बाद भी दूकान के बदले की पैसे नहीं मिले कागज़ी काम में उससे ज्यादा पैसे लग गए थे 
बहन और छोटा भाई उस वक़्त महज़ 5 , 7 साल के थे।  पिताजी बैंक और मुआवजे की रकम के लिए दफ्तर घूमते घूमते अपनी आखरी सांस को गिन लिए। 

भैया ने तेलंगाना जाते ही घर की हालत संभाल ली  पर सोचा के अकेले जाने से भार सारा उन पर है छोटी बहन मिताली और चीकू को आगे तक पढ़ाया जा सकता है भले हम ना पढ़ पाए तो क्या इसी सोच ने मुझे भी पढ़ाई छोड़ कमाने पे मजबूर कर दिया 
 
2010 में मै अपने दोस्तों के साथ छत्तीसगढ़ आया 

शुरुआत बहुत अच्छी हुई बाजार में पूरा दिन बित जाता, एक साल फल की दूकान में काम करने के बाद मैंने खुद का काम शुरू किया , चाय की टपरी कॉलेज के पास फिर गर्मियों में तरबूज की दूकान।  


लॉक डाउन इस चरण में अब मेरी भी हिम्मत  जवाब देने को है , तीन महीने में जमापूंजी अब ख़तम ही हो गयी 
ख्याल आया की सीतारींन बाई से मिलते हुए घर चला जाऊ.

आज बाजार का समय बस सुबह 7 से दोपहर 3 बजे तक है . परसो के लिए एक ट्रक ड्राइवर से बात हो गयी ओडीशा जाने को. 
 ये क्या ऊर्जे से भरा तेज चेहरा आज उदास सा है 
मैंने जा के पूछा काकी का कर रही हो 
उसने धीरे से कहा - का करे, समय है ना पैसा घर का राशन ख़तम होने  को है 
सूना है तू घर जारा बड़ा तैयार है आज तो 
हां जी काकी माँ परेशान है और मेरा धंदा भी मंदा है 
तूने सूना क्या काकी तेरे लिए एक खबर लाया मैं 
सीतारींन बाई - सूना दे खबरीलाल 
सरकार ने कहा है लोकल वोकल जैसा कुछ जिसमे स्थायी व्यापारी लोगो के सामान को तरजीह देने को जनता से कहा है. 

काकी अपने टोकरी से चने और पुराने लगी (सामान और डालना ). 
कुछ कहने ही वाली थी की एक 
ग्राहक तेज तर्रार अपनी गाड़ी दौड़ाते आया और पूछा - दाई चने कैसे लगाये ?
काकी - 10 रुपया बाबू 
ग्राहक - 8 में दे दो 
काकी ने एक पैकेट निकाला और पैसे लेकर  थमा दिए । 
पैसे डब्बे पे डाल कर कहने लगी 
के बोल रहा था तू सरकार स्थायी व्यापारी ?
मैं गाँव से यहां सुबह से आयी हुई हूँ , चने विदेश से तो ना लाती 
मेरे ही खेत के है 

 मोल कम ना करती तो ये भी नसीब ना होता 
दूकान के 500 की प्रोटीन पावडर  सस्ती है 
मेरे खेत के चने काफी महंगे है।  
दूकान बंद होने को है अब पुलिस आती ही होगी 
ये आज के 8 रूपये ही मेरी पुरे दिन की पहली कमाई है।