Monday, January 18, 2021

जिसे होना था बेपरवाह वो बैराग हो चला

शिकार हो चला, बेकार हो चला 
जिसे होना था बेपरवाह वो बैराग हो चला 
अपनी चाह थी, चाह की वाहवाही थी 
वो जिम्मा उठाता तो खैरात हो चला 
अपनी आश थी वो बेगाना हो चला 

उम्र के दरवाजे में क्या बुनता ख्वाब 
बूना भी तो क्या देखा वो ख्वाब 
बेड़ीया कसी हुई थी 
वो अपने पांव तोड़ चला 

बिस्तर की सिलवटों तक सिमटता गया 
ठंड है मन में 
गरम खून बह चला 

नींद आती तो भी आती कैसे 
जड़े सी जमी थी कोने में इश्क़ 
पर अपने वो फैला के चला 

फरियाद लगाए क्या खुदा से भी अब 
जाने किस तस्वीरों में जिंदा है जिद्द 
खुद्दारी अपनी रखी पीठ में
ना मांगा दुआ 
बस अपनी धाक जमाते चला।

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