आज कई दिनों बाद अपने बेटे से मिला लॉक डाउन के बाद मेरी टाइल्स की दूकान वैसे बंद थी और मैंने सोचा था की छोटा बेटा भी अगर घर आजाये तो बेहतर होगा मुझे उससे बातें करने का मौका मिलेगा,
हमेशा से मैं चाहता था की ज्यादा से ज्यादा उनके साथ समय बिताऊं ,
एक उम्र में उनकी माँ जब हम तीनो बाप बेटे को छोर कर गयी तो मैंने भी दोनों बच्चो की परवरिश में और ज्यादा ध्यान देना चालू कर दिया
बड़े चाचा जी घर में एक लौते बुजुर्ग थे उन्होंने दूसरी शादी करने को कहा पर मन माना नहीं मेरा,
हालाँकि शादी मैं करता भी कैसे, विशु और जिशान्त में अब मुझे परिवार समेटता हुआ बेहतर लगा।
खैर , घर की जिम्मेदारी और अपने व्यापर में मशगूल होते होते मैंने बस जिम्मेदारियां साड़ी निभाई फिर भी जब बच्चे मुझ से अपनी बात नहीं कह पाते थे तो लगता था शायद अब भी मैंने कहीं कमी करदी हो,
और एक बाप बनने के बाद सबसे ज्यादा इस चीज की खलिश मुझे अब कहीं और धकेल रही थी,
शायद यह हर किसी के साथ होता हो या ना होता हो
शायद हर आदमी मेरी तरह सोचता हो या ना हो पर मैंने अपने दोस्तों में भी यही देखा
स्कूल टाइम से ही विशु काफी समझदार और सलीके से रहा करता था, बिलकुल अपनी माँ की तरह सुलझा हुआ
और जिशान्त
जिशान्त के बगावती तेवर देख कर मुझे अपनी बचपन याद आती थी
वैसा ही झगड़ा वैसा ही गुस्सा वही बचकानी हरकत और बहुत सारे भावनाओ का छुपा कर रखना
उसे संभालना मेरे बस में कबि नहीं रहा
न की तब जब वो छोटा था
ना अब
उसकी जिद्द थी उसे अपने दोस्तों के साथ वाले कॉलेज में जाना है और वही बहार रहना है
मैंने कोई बहस नहीं की
जिशान्त को देख कर मैं खुद के स्वाभाव से भी रूबरू होने लगा था ,
जो मैं जो था जो मैं हूँ और जैसे मैं रहा करता था, अड़ियल सा
पर इनदोनो की माँ थी जो मुझे जानती थी मुझे समझती थी और पता नहीं क्या जादू करके मुझे शांत कर देती थी
पिताजी को रीना पसंद थी वो भी उन्हें माँ की तरह लगती उन्होंने पहले तो मना किआ पर उसके घर आने के बाद जैसे वो उसकी ही तारीफ़ करने में लग जाते थे
कई बार जिशान्त को गोद में खिलते हुए वो मुझसे कहते
ये तेरी तरह है और तुझसे भी ज्यादा परेशां करता है देखना एक दिन यह तुझे बताएगा की तुम है कितना परेशां करते थे
और फिर रीना कहती - पिताजी आप टेंशन ना लो जिशान्त आपके बेटे जैसा ही है भले अड़ियल पर मुहब्बत से भरा हुआ
टेबल पर चाय ठंडी हो गयी इतने में विशु नाहा कर आया और बोलने लगा - पापा चलो
हम दोनों जिशान्त को लेने गए उसके कॉलेज हॉस्टल
विशु ने गाडी निकाली और मैं अब सोचने लगा था की पता नहीं जिशान्त क्या रियेक्ट करेगा
हमारी दो साल से बात ही नहीं हुई विशु से जिशान्त की घंटो बात होती पर मुझसे वो हमेशा खफा सा रहता
मेरी हर बात उसे ताना लगती
जिद्द उसका देख कर अब मैं समझने लगा था आचरण तो मेरा भी वही था फिर पिताजी क्या करते थे उन्होने मुझे कैसे संभाला मैंने भी वही किया उसकी हर जिद्द पूरी की उसे रोकना टोकना बंद कर दिया
और यही जगह मुझे लगता था की
अपना अक्ष भले मजबूत हो या कमजोर जब तक उसे हम अपने पर होते नहीं देखते हम खुद को काफी उम्दा ही समझते है
माँ ने संभाला क्यूंकि मैं उनका बेटा था वो समझाती दुलार से सहलाती रीना के आने के बाद वो मुझे और मेरे व्यवहार को बर्दाश्त करती
और अब जब मैं जिशान्त को देखता हूँ
लगता है भगवान मुझे ही परोस दिया है मेरे लिए ताकि मुझे भी पता चले मैंने क्या किआ और मेरे साथ वालो को क्या तकलीफे हुई
और जैसे मुझे प्यार से मनाया जाता था, समझाया जाता था मैं इतना जान गया था की जिशान्त को भी प्यार से समझाया जा सकता है
अचानक विशु ने गाडी रोकी और कहने लगा पापा आप याद कर रहे हो क्या जीशु को ?
मैंने बोला - हाँ बेटा, तुम्हारे जनरेशन में शायद ओपन उप होना इजी होगा बाकी लोगो से काश तुम अपने लोगो से ओपन उप हो पाते थोड़ा कोसिस कर पाते
विशु ने कहा - पापा मैं समझता हूँ आपको, और मेरी आपकी बात अच्छी होती तो है जीशु को लेकर आप टेंशन मत लो वो भी आपसे बहुत प्यार करता है बस बोल नहीं पता एकदम आपकी ही तरह यही वो
मैंने कोई जवाब नहीं दिया
विशु की यह बात मुझे लगी, सायद जिस पर मैंने कबि ध्यान नहीं दिया और इतना बोलते हुए वो नाश्ता लेने चले गया
अब मुझे लगने लगा था की शायद मुझे खुद पर थोड़े बदलाव करने होंगे
मैं अब खुश था की मुझे कोई तो उपाय मिला
विशु के साथ नाश्ता करने के बाद हम निकल पड़े और अब एक गहरी झपकी मार ली
हॉस्टल में जाने से पहले मैं मुस्कुराया,
हम रिसेप्शन ऑफिस के पास थे और विशु जिशान्त के साथ बैग पकड़ कर आ रहा था
जिशान्त को देख कर मैंने हलकी सी होंठ फैला कर स्माइल दी
हालाँकि मन तो कर रहा था ठहाके मार कर हसु
उसका चेहरा, वो तेज़ आँखे और वही अड़ियल स्वाभाव दीखता हुआ उसका चलन
उसने मुझे देखा मेरे पैर छुए और गाड़ी की तरफ चला गया
मुझे उसका यह व्यवहार अंदर से खा गया
हमने हॉस्टल की रजिस्टर में sign किये और अब मुझे समझ आ गया की अब भी जिशान्त मुझसे गुस्सा है
पुरे रास्ते मैंने सोचा बात करू उसका हालचाल पुछु
पर विशु ने हालत की डोर संभाली और मेरे हिस्से की उत्लाहट को कम कर दिआ
उसने
जीशु से एक एक करके सवाल पूछने चालू कर दिए
कैसा चल रहा
पढ़ाई
दिवाली में क्यों नहीं आया
फीस सही पे कर रहा की नहीं
पैसे कम तो नहीं पड़ते
घर में सब तुझे याद करते है वगेरा वगेरा
और इन सबका जवाब देता
तो हल्कापन मुझे महसूस होता

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