ये अलफ़ाज़ है कुछ उन लम्हो के दर्द के तो कुछ ऐसी ही निहायती कमजोर दिल के ,
कई बार भीड़ में भी मैं इतना तनहा हो जाता हु की ,खुद को कहा छुपाऊं ये जगह ढूंढ़ता हु
कुछ अलफ़ाज़ है मेरे दिमाग के उफनते शोर के तो कुछ है शांत सी सुलझी हुई कोनो के
और अगर शब्द से गहराई के समझ नहीं आते है तो बेशक आगे ना ही पढ़े।
क्यूंकि अनुभव कहता है जिसे तमाशे देखने के शौक होता है वो हमेशा भीड़ के हिस्से होते है। पढ़ने वाले सभी से ये रिक्वेस्ट है की अगर कुछ चंद शब्दों से जुड़ा हुआ महसूस करे तो कमेंट बॉक्स पर जरूर बताये
क्यूंकि अनुभव कहता है जिसे तमाशे देखने के शौक होता है वो हमेशा भीड़ के हिस्से होते है। पढ़ने वाले सभी से ये रिक्वेस्ट है की अगर कुछ चंद शब्दों से जुड़ा हुआ महसूस करे तो कमेंट बॉक्स पर जरूर बताये
मुझे भी जानना है कितने दिल है यहां जो उखड़े से है 💔
और कितने दिमाग है जो सुलझे से है ,💛
कितने है जो खुद से लड़ना चाहते है ♡
और ऐसे कितने जो लड़ाई कर चुके है ❤️
किस भागदौड़ में है कहा तक भागेंगे। जिंदगी से और इसके दिए हुए जज्बातो से
हाँ मालूम है हिसाब यहां के
जमाने के कुछ हिसाब समझ तो आये जिनसे बगावत किया है मैंने
ऐसी ही हर रात कभी पन्नो पे सभी अहसासों को उकेरा है मैंने ,,
तो चलते है ऐसे ही अल्फ़ाज़ पर नजर डालते है
हर स्थिति के नहीं पर जितने भी देखे है , महसूस किये है , कुछ बुरे लोगो में तो कुछ साफ़ लोगो में तो कभी खुद
पर या अपनों पर। . हाँ ये वही सब है
. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . .
मै चल रहा था ,,ऐसी ही नहीं ,
मै चल रहा था ,,ऐसी ही नहीं।
की किसी भीड़ में खो जाऊं
पर खोये हुए भीड़ में मैंने हजारो देखे
देखे ऐसे भी साये जो अपने से थे
यक़ीनन अपने से ही थे
पर कब तक बनते मेरे भी
वो जैसे भी थे साये ही तो थे
खुदगर्जी को नहीं नापा था कभी मैंने
ऐसे डुबकी लगाई की
समंदर भी फीका सा लगने लगा
किसी रौशनी को छूने की ताक में था मै
किसी अदब सी रौशनी को छूने की ताक में था मै
की कुछ बंजारों से ये भी नाह देखा गया
शायद चल रहा था मैं
ऐसी ही नहीं। ... . .
एक तरफ़ा भी नहीं था मेरा कोई अंदाजा कहीं
मै लाख कोशिश के बाद
यक़ीनन कई कोशिशों के बाद भी
जो मैंने पाए वो हार ही थे
अब छूट सा रहा था इस भीड़ से विस्वास कहीं
जहा अहसास नहीं वहाँ बगावत ही सही
मै चल रहा था ऐसे ही नहीं
कई मुद्दते दर्द और जिद्द के बाद
मैं मिला हूँ खुद से
कैसे भी देदू इजाजत किसी भीड़ को
वकालत करने मेरे मुक्क्दर का
मै चल तो रहा हु अब भी
पर भीड़ में नहीं। . . . . . . . . . .. . . . . .
== जिंदगी अब या तब जीना सीखा ही देती है जनाब
सितम ,धोखा ,गरीबी ,दर्द ये सारे इसके सबसे असरदार पाठ में ही तो आते है।
..........by Akshay .......
तो चलते है ऐसे ही अल्फ़ाज़ पर नजर डालते है
हर स्थिति के नहीं पर जितने भी देखे है , महसूस किये है , कुछ बुरे लोगो में तो कुछ साफ़ लोगो में तो कभी खुद
पर या अपनों पर। . हाँ ये वही सब है
. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . .
मै चल रहा था ,,ऐसी ही नहीं ,
मै चल रहा था ,,ऐसी ही नहीं।
की किसी भीड़ में खो जाऊं
पर खोये हुए भीड़ में मैंने हजारो देखे
देखे ऐसे भी साये जो अपने से थे
यक़ीनन अपने से ही थे
पर कब तक बनते मेरे भी
वो जैसे भी थे साये ही तो थे
खुदगर्जी को नहीं नापा था कभी मैंने
ऐसे डुबकी लगाई की
समंदर भी फीका सा लगने लगा
किसी रौशनी को छूने की ताक में था मै
किसी अदब सी रौशनी को छूने की ताक में था मै
की कुछ बंजारों से ये भी नाह देखा गया
शायद चल रहा था मैं
ऐसी ही नहीं। ... . .
एक तरफ़ा भी नहीं था मेरा कोई अंदाजा कहीं
मै लाख कोशिश के बाद
यक़ीनन कई कोशिशों के बाद भी
जो मैंने पाए वो हार ही थे
अब छूट सा रहा था इस भीड़ से विस्वास कहीं
जहा अहसास नहीं वहाँ बगावत ही सही
मै चल रहा था ऐसे ही नहीं
कई मुद्दते दर्द और जिद्द के बाद
मैं मिला हूँ खुद से
कैसे भी देदू इजाजत किसी भीड़ को
वकालत करने मेरे मुक्क्दर का
मै चल तो रहा हु अब भी
पर भीड़ में नहीं। . . . . . . . . . .. . . . . .
== जिंदगी अब या तब जीना सीखा ही देती है जनाब
सितम ,धोखा ,गरीबी ,दर्द ये सारे इसके सबसे असरदार पाठ में ही तो आते है।
..........by Akshay .......




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