Sunday, March 15, 2020

ईजाद सा स्याह करता है मुझे

गुम नहीं गुमशुदा हूँ मैं की ईजाद सा स्याह करता है मुझे ,
बिलखते है सवाल जवाब हो जाने को ,नायब हो जाती है वो

किताब लिखते हुए
गुम नहीं थोड़ा गुमशुदा हूँ मैं ,,

चुने है अँधेरे में हकीकत के लफ्ज़
पशिचते है अहसास जगह बनाने को
शराफत रहती है बवाल न हो कहीं
रोज़ कोरी करता हूँ अंदर के कागज़ को ,,

हाँ पन्ने भर जाते है लिखते हुए
खैरात में जैसे घायल ज़ज़्बात है ,,

तलब कलम की पूरी साफ़ है
राही सही थोड़ा गुमराह हूँ मैं ,,

गुम नहीं थोड़ा गुमशुदा हूँ मैं
की ईजाद सा स्याह करता है मुझे .............

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