बगावत -
बगावत और बगावती जैसे अंदाज़ से महरूम था मै , मेरा नाम इस लफ़ज़ का ऐसा साथी था जो बिना किसी एक के बगैर अधूरा था।
इससे सब वाकिफ थे ,पहचान तो यही रह गयी थी , वैसे यह कोई बदलाव नहीं था जो हुआ धीरे धीरे हुआ बढ़ती उम्र ,खौलता खून ,बेबाक अंदाज़ ,जिद्द जोश नए उमंग और हर समय किसी नए की तलाश जैसे मुझे और ऊर्जा से भर देती थी , मेरी जिज्ञासा ख़त्म ही नहीं होती थी ,और उस पर नमक का काम करती थी बचपना और बचकानी हरकत ,, यह तो मेरी बात रह गयी थी ,खैर लोग और लोगो की नजरे उस समय जो जबरदस्ती थोपे लगाती थी वो तो उसी समय तक ही रहा ,जहाँ हमें सोचने पर मजबूर किया जाता था की लोग क्या सोचेंगे ?
शुक्र है समय बदलता है , बदलाव लाता है और मेरे लिए अच्छा था ,उम्र का पड़ाव कहा तक ठहरता ,और रोकता मुझे भी ,मेरी जिद्द पर लोग उंगलियां उठाते चले गए और मै अपने ही सनक पर ठहरता गया जैसे नवजीवन की कोई शैतान बच्चे की तरह , जिसे सहारा मिला तो मेरे ही बगावती अंदाज़ का ,किसे पता था ये बाग़ी आँखे कभी गुलाबी भी होंगी और मैं कभी नौवे आसमान का सफर रंगीन तितलियों के साथ करूँगा। कभी खुद को अकेले ही अपने हथेली से सम्हालने वाला लड़का , आज किसी सुर्ख छुअन में शुकुन ढूंढ लेगा किसी शांत आँखों में एक किनारा देख लेगा ,
नीरा से पहली मुलाकात मुझे आज भी याद है मै पहली ही बार में उससे कोई और किसि प्रकार का आकर्षण मेहसुस नहीं किया ,,पर नीरा का मुझसे यूँ नजर मिलाने की कोशिश से मै धीमे से प्रभावित हो रहा था , वो असर तो था जिससे मै मेहफ़ूज़ नहीं हो पाया ,
पहली बार अपने घर से दूर अपने दोस्तों के साथ हम सभी अपने कॉलेज के साइड से ट्रेनिंग लेने आये थे एक साल के लिए ये ट्रेनिंग में मै सीनियर था और मुझे दो तीन दिन के बाद ही वापस घर निकलना था क्यूंकि मै जूनियर के साथ आया था , टेढ़ी नाक भूरे बाल और लाल गाल जो मुझे उतना भी पसंद नहीं था , नीरा भी सीनियर थी ,, जो मुझे हेड ऑफिस में पता चला ,, हमारे बिच उन दो दिनों में थोड़ी ही बात हुई ,हमारे नजरो का टकराना सिर्फ हम तक ही नहीं था वहाँ सबको इसकी खबर हो रही थी , वो दिन आया जब मुझे वापिस घर जाना था , मैंने यहाँ वहाँ से दोस्तों से बात करके मैनेजमेन्ट की फाइल से उसकी फ़ोन नंबर निकाल ली। . इस आकर्षण में मै जहां बह रहा था मुझे उसका पता था , मै अपने जज्बातो से भी बखूबी पहचान रखता था और यही बात बहुत जल्दी मुझे ही ठगने वाली थी ,मै घर आ चूका था मैसेज के जरिये सिर्फ बात ही नहीं और भी चीजे बढ़ रही थी बराबर दोनों तरफ आग लगी थी , , और उससे मिलने की जिद्द रोके नहीं रोक पता था , पहली बार ही तो हुआ था ऐसा कोई जिंदादिल परवान चढ़ने को था जैसे ,
हम मिलने लगे उसके शहर में ,, जो शुरुआत में छोटी छोटी बॅंक और छुट्टियां मारता था अब वह अपनी नौकरी घर छोड़ अपनों से झगड़ कर उसके शहर में बसने चला गया , वजह नीरा ही तो थी , जो बिंदास बाग़ी जिंदगी थी वहाँ हसीं रातें आने लगी , और ये भी तो ऐब ही थी हम इंसानो की हम खुशियों पर फुलस्टॉप कहा लगाना जानते है ,बस उस ओर हर दिन बढ़ते आगे बढ़ जाते है , और छोटी छोटी दुखद सवालियां चिन्ह छोड़ जाते है
वो उसकी बातें उसके साथ हर वक़त बिताना मै इन्हे अब अपने भविष्य में सजा रहा था , उसके साथ को तरसता ,उसकी तीखी व्यहवार जैसे मुझे मारने लिए अब काफी थी , मुहब्बत नीरा के साथ और नजदीकियां इतनी बढ़ गयी थी उसे खोने के डर से ही कंपन होती सांसे और मुरझाती आँखे बस ,,
मेरे जिद्द में अब नीरा भी शामिल हो चुकी थी जिसकी खबर तक नहीं थी उसे , नाह मुझे। नीरा के साथ मै कब बदला और बदलने को तैयार भी हुआ पता ही नहीं चला ,थोड़े से भी ज्यादा वक़्त बिता लिया था हमने साथ में शायद पर 8 साल कितना कम और कितना ज्यादा होता है ? वो शहर में अपनी पढाई और ट्रेनिंग पुरे होते ही घर चले गयी , अब उससे दुरी को खुद समझाना मेरे लिए दिनों दिन मुश्किल होता जा रहा था हसींन रातो ने अब बहस बैचेनी का रूप ले रही थी , कुछ था जो मेरा समझना बहुत जरुरी था , उसका रूखापन मुझे कही भी रहने पर भी सिर्फ नीरा की तरफ खींचते हुए ले जाता था ,
मैंने तय किया अपनी बैचेनी को थामने का , उससे कई सवाल किये ऐसे सवाल जिसके जवाब मै जानता था और इसी उम्मीद में वो यहां खरी नहीं उतर पायी ,
एक हामी भर कर मै घर लौट आया फिरसे सब छोड़ कर ,टुटा हुआ और उस टूटने की आवाज को दबाते हुए कदम रखे ,की कहीं अगर एक आंसू छलकेगी और जो कभी रोता नहीं था वो इंसान आज ख़त्म हो जायगा ,कुछ दिन बीते , नीरा की हसीं ,उसकी बातें हर वक़त निचोड़ रही थी। मैं रोक नहीं पाता था नाह उसके चेहरे को आँखों में लाने से ना उसकी यादो को मन से भगाने में , कभी खुद पर सवाल उठाता तो कभी खुद के होने पर ,अपने अंदर के अम्बार को ऐसे तैसे बहन और माँ के नजरो से बचाता फिरता कभी इस कमरे से कभी उस कमरे तक चलते हुए बार बार मुँह धोते ,पानी पि पि कर ,एक धुंद की नाकाम कोशिश नाह महक पाने की कब तक चलती यूँ ही ,
एक दिन माँ ने धीरे से मेरे पास आकर पूछा - बेटा कुछ हुआ है क्या ?
मेरी आँखे अगर उस वक़त तुरंत उठती तो माँ पढ़ लेती और अपने इस जवान जोशीले बेटे की नम आँखे ,खुद को इतना कमजोर मै कैसे दिखाता ?
उठ कर जाने लगी माँ को मैंने पकड़ा और चीख चीख कर रोने लगा ,ये हिस्सा देख कर बहन भी सहम पड़ी और पूछने लगी भइयाँ क्या हुआ ,, आंसू सब कह रहे थे बिना मेरे कुछ कहे ,मैंने भी जबान बंद रखी ,और मन ही मन में सोचने लगा मैंने कितनी दफे बगावत की थी नीरा के लिए हम दोनों के लिए। और अब मै तो बस सिमटना चाहता था धीरे धीरे माँ के आँचल ने यह कह के मेरे आंसू सोंख लिए की तू सही था तेरी बगावत भी सही थी बस ये हो गया एक गलत के लिए ,जिसका खमियाज़ा यही होना था शायद।
by-vicky

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