Thursday, March 26, 2020

मंज़र थोड़े तबाह से - 2020




रूस  का भूकंप 
शहीद होते जवान 
काबुल के आतंकी हमले 
और वायरस के मुँह में आधा जहान 
बंद हो गए कारोबार सारे 
खेतों को भूखा है किसान 
धुंए से मिली चंद दिनों की आजादी 
कयोंकि गाड़ियां  हो गयी है जाम 
दुगनी रफ़्तार में हो रही है मौते 
थम गया है सब और सबकी नींदे 
डर है जिम्मेदारी है 
इतनी हावी 
भविष्य को लेकर है सब हैरान 
कहीं लोग घर में हंस खेल रहे 
कहीं घुट कर जिंदगी ख़तम हो रही 
कल तक जो था खुद का मालिक 
आज शायद लाचार है इंसान ?? 

तब्दील हो गयी तस्वीरें धीरे धीरे अमेजन की राख से 
रुख हवा का फैक्ट्रियों से साँस की तरह लगा रखा था 

कट रहे थे हरियारी विकास के नाम पे 
अरे उसने ही तो बचा रखा था 

सुनामी धरती के वो आंसू है 
और वायरस उसके सीने  में पलता  गंध 

हम इंसानो की अपनी बर्बादी अलग 
हमने तो खुद से ही छेड़ रखी है जंग 

पृथ्वी ही बीमार है हम कैसे बचेंगे 
मिला निवारण ऐसा 
खुद को आईसोलेट रखेंगे। 






(आईसोलेट-अलग करना )

follow for two lines shayri at Facebook /Instagram -  @Waakifiyat 






Sunday, March 22, 2020

खैरियत





हमें मुन्तजिर था की हमारी खैरियत पूछी जायेगी 
खबर क्या थी की हमसे हमारी गुस्ताखी पूछी जाएगी 

बेसबब को मुलाकात ही जरिया बना जब भी 
इत्तेफ़ाक़-ए-फ़क़त हमसे सिर्फ लिहाजे पूछी जाएगी 

हुनरमंद तो नहीं बस अलफ़ाज़ के ठिकाने मिले 
कसम वादों में बेक्कार ही परवाने मिले 

रसूख था बस इश्क़ का ,महरूम ने ऐतबार रखी 
जहन में मक्कार लिए उन्होंने अपनी  आगाज़ रखी  

वो गैर थे गैर ही रह गए ,किसी लफ्ज़ के शोख थे 
सुकून की फ़रियाद उनकी अब बेवजह हो जाएगी । 

नैनो की पीरह



नैनो की नम पीरह  पढ़ी नहीं जाती 
जिस्म से ही बस जिन्दा क्यों है लोग 

चीखता ही रह जाता है मासूम आवाज कहीं 
बेमतलब  के शोर में खुश क्यों है लोग 

ये विधान है क्या कोई 
ये विधान है क्या कोई 

इनमे इल्म तो दिखता नहीं 
जरुरी है  कठोर हो जाना गर

तो 

नम करती नैनो को, वो पिरह 
रखते क्यों है लोग ?? 
 

Saturday, March 21, 2020

पंछी बावरा रे




पंछी बावरा पहले फ़क़त से 
दिल लगाए रे 

टूटे जो पंख 
फिर इश्क़ से मोह हटाए रे 

पंछी बावरा आसमा पे पालक बिछाये रे 
निगाह पे है वो एक शिकार के 
ये उसे कौन बताये रे 

टूटे थे पंख फिर भी दिल उसका 
उड़ने को फड़फड़ाये रे 

रंगीन जमीं में उसके 
अब तो पांव भी थरथराये रे 

पढ़ लिया नील आसमान ने उसके तालाब को 
हवा से कह के 
पास उसके पैगाम एक भेजवाये रे 

हवा ने दरकार की 
पंखो में उसके सूफी भरी 

पंछी खैर बैठा था 
एक छोऱ पे 
धड़कन उसका भी चिल्लाये रे 

अब क्या 

लेकर इश्क़ आसमा में 
पंछी ने फैला दिए हवा में पंख 

देख ये मिजाज़ 
कायनात भी इठलाये रे 





Thanks for reading ,leave a comment if you like and share if you want ,♥️

उदास दिल देख बिलख जाता हूँ








एक  अजीब सी ख़ामोशी के हर दिन पल्ले पड़ जाता हूँ 
बेनकाब होते चेहरे ही नहीं ,उठते परदे से भी डर जाता हूँ .♡♡♥️


बड़ी मोहिनी है दुनिया के अदायगी  की 
नाकाम कोशिशे है तमाम 
पर फिर मैं  इन्ही में सिमट जाता हूँ ♡♡♥️


सिखाते है रोज यहां के लोग मुझे 
जो खुद में है उसे मारना है कैसे♡♡♥️

और उसे , भीतर जगाये रखने के कवायद 
में सहूलियत से बार बार बिखर जाता हूँ ♡♡♥️


बगावत नहीं उलटे रास्ते पे चलने के  लिए 
पर उन मशरूफियत पे उदास दिल देख बिलख जाता हूँ।  ♡♡♥️










you can also follow me on Insta - @Waakifiyat for two lines poetry . 



Monday, March 16, 2020

May be i am a Mess









Gradually ointmenting myself 
by graveyard shift of unnamed feelings
later immensely dissolve in own ecstasy 
may be i am a Mess ,,


But holding a coolness of dull fiction
not interested to play that chess
been a doubting thomas
what vecillated the thoughts 
that catchy double face ?

when you can create for 
yourself divine hot potatoes

by each personality & its thousand grudges
still i would not choose same old case 

May be I am mess 

बिना सिद्दत के उन्हें सब चाहिए






❤️किसी किनारे में है वो 
लहरों के डर से 

हिसाब में बाते बस नाव की 
तैर पाते नहीं 

पर समंदर चाहिए 
मंझे हुए से पूछो कवायद उनकी 

किरदार किस कदर तराशी गयी 
जहन में मची तिस को भी 
उसके लायक कहर चाहिए 

दिल रूह तन चाहिए 
बिना सिद्दत के उन्हें सब चाहिए ❤️

when he asked me to write on him







 ⚘⚘⚘सरल होना मुश्किल होगा शायद 
तुम्हे वो मैं  राह दिखाना नहीं चाहता 

तुम कठिन ही सही 
पर अलग हो 

जानकर वो कारन 
तुम्हे साधारण मैं  करना नहीं चाहता 

ब्यान कर दू तुम्हारी कहानी गर 
मजूर होगा शायद तुझे यह 
लिखू तेरे जहन  के आग 

पढ़ले  हर कोई 
वो लफ्ज़ तुझे मैं बनाना नहीं चाहता 



लिखना आसान होगा शायद 
तुम पर लिख कर 
मैं  तुम्हे आसान बनाना नहीं चाहता।   ⚘⚘⚘



तलाश और तिशनगी

तलाश और तिशनगी। ...





                  ♥️ डर नहीं खरोच यकीं बेहिसाब रख रहे की 
                        जला देती है अक्सर आग वो 

                   ♥️  फक्त अब चिंगारी सा हो गया है 
                       फिर संगीन गुस्ताख़ के नज्म में सिद्दत 

                   ♥️ नए पलकों पे रख रहे की 
                       आबाद होना साजिश सा हो गया है 

                    ♥️ बुनियाद बेबाक कही तरसते थे 
                      सफर संजीदा सुर्ख बिलखते थे 

                    ♥️ बेपरवाह भटकते कहीं  तलाश और तिशनगी 
                      मुखड़ा जिंदगी का मुहब्बत रख रहे की 

                    ♥️ अंतरा नायाब होना लाज़मी सा हो गया 

Sunday, March 15, 2020

चाहत






♥️ चाहत रखने भर से मिल जाती गर मंजिले
                    ए राही  हो या तू कोई आशिक।

     तू आवारा  रह जाएगा  इस चाहत के  सफर में
                    मिलती तो उसे ही है मजिले जिसने।

     चाहतों  को अपनी हाथों से लकीरो में बनाया
                   खो दिया  खुद को और कोशिशो में दहलाया ♥️♥️♥️

ईजाद सा स्याह करता है मुझे

गुम नहीं गुमशुदा हूँ मैं की ईजाद सा स्याह करता है मुझे ,
बिलखते है सवाल जवाब हो जाने को ,नायब हो जाती है वो

किताब लिखते हुए
गुम नहीं थोड़ा गुमशुदा हूँ मैं ,,

चुने है अँधेरे में हकीकत के लफ्ज़
पशिचते है अहसास जगह बनाने को
शराफत रहती है बवाल न हो कहीं
रोज़ कोरी करता हूँ अंदर के कागज़ को ,,

हाँ पन्ने भर जाते है लिखते हुए
खैरात में जैसे घायल ज़ज़्बात है ,,

तलब कलम की पूरी साफ़ है
राही सही थोड़ा गुमराह हूँ मैं ,,

गुम नहीं थोड़ा गुमशुदा हूँ मैं
की ईजाद सा स्याह करता है मुझे .............

Puraani baate -Motivational poem




💝Ab wo baate nahin hongi jinka koi mukkaddar nahi
     Ab wo aansu nahi honge jinka wasta bite kal se tha
     Ab unhe b hona padega jo iraado me hai
     Ab logo se kam hi ho mulakat jarur
     Naye faislo se rubru honge roj
     Sikko k hote hai do pahlu magar ab ek wo b honge
     Ab baaton se mukrna nahin
     Unse mukkammal krnaa hai
.

 .


.

.


.

     Irade likh diye hai panno me ab unhe krna hai ..✌💝

अलफ़ाज़




ये अलफ़ाज़ है कुछ उन लम्हो के दर्द के तो कुछ ऐसी ही निहायती कमजोर दिल के ,
कई बार भीड़ में भी मैं इतना तनहा हो जाता हु की ,खुद को कहा छुपाऊं ये जगह ढूंढ़ता हु 
कुछ अलफ़ाज़ है मेरे दिमाग के उफनते शोर के तो कुछ है शांत सी सुलझी हुई कोनो के 
और अगर शब्द से गहराई के समझ नहीं आते है तो बेशक आगे ना ही पढ़े।
क्यूंकि अनुभव कहता है जिसे तमाशे देखने के शौक होता है वो हमेशा भीड़ के हिस्से होते है। पढ़ने वाले सभी से ये रिक्वेस्ट है की अगर कुछ चंद शब्दों से जुड़ा हुआ महसूस करे तो कमेंट बॉक्स पर जरूर बताये

मुझे भी जानना है कितने दिल है यहां जो उखड़े से है 💔
और कितने दिमाग है जो सुलझे से है ,💛
कितने है जो खुद से लड़ना चाहते है ♡
और ऐसे कितने जो लड़ाई कर चुके है ❤️
किस भागदौड़ में है कहा तक भागेंगे। जिंदगी से और इसके दिए हुए जज्बातो से 
हाँ मालूम है हिसाब यहां के 
जमाने के कुछ हिसाब समझ तो आये जिनसे बगावत किया है मैंने 
ऐसी ही हर रात कभी पन्नो पे सभी अहसासों को  उकेरा है मैंने ,,

तो चलते है ऐसे ही अल्फ़ाज़ पर नजर डालते है
हर स्थिति के नहीं पर जितने भी  देखे है , महसूस किये है , कुछ बुरे लोगो में तो कुछ साफ़ लोगो में तो कभी खुद
पर या अपनों पर। . हाँ ये वही सब है









  . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . .

मै  चल रहा था ,,ऐसी ही नहीं ,
मै  चल रहा था ,,ऐसी ही नहीं।

की किसी भीड़ में खो जाऊं

पर खोये हुए भीड़ में मैंने हजारो देखे
देखे ऐसे भी साये जो अपने से थे
यक़ीनन अपने से ही थे
पर कब तक बनते मेरे भी
वो जैसे भी थे साये ही तो थे

खुदगर्जी को नहीं नापा था कभी मैंने
ऐसे डुबकी लगाई की
समंदर भी फीका सा लगने लगा
किसी रौशनी को छूने की ताक  में था मै
किसी अदब सी रौशनी को छूने की ताक में था मै

की  कुछ बंजारों से ये भी नाह देखा गया
शायद चल रहा था मैं
ऐसी ही नहीं। ... . .

एक तरफ़ा भी नहीं था मेरा कोई अंदाजा कहीं
मै लाख कोशिश के बाद
यक़ीनन कई कोशिशों के बाद भी
जो मैंने पाए वो हार ही थे

अब छूट सा रहा था इस भीड़ से विस्वास कहीं
जहा अहसास नहीं वहाँ बगावत ही सही
मै  चल रहा था ऐसे ही नहीं

कई मुद्दते दर्द और जिद्द के बाद
मैं मिला हूँ खुद से
कैसे भी देदू इजाजत किसी भीड़ को
वकालत करने मेरे मुक्क्दर का

मै चल तो रहा हु अब भी
पर भीड़ में नहीं।   .  . . . . . . . . .. . . . . .



== जिंदगी अब या तब जीना सीखा ही देती है जनाब
      सितम ,धोखा ,गरीबी ,दर्द  ये सारे इसके सबसे असरदार पाठ  में ही तो आते है।






























                      ..........by  Akshay .......

देखे सैकड़ो भेष





घुमा न कोई देश पर देखे सैकड़ो भेष 
बौखलाते सारे भेद और  देख के सेंक देते है

 मासूमीयत पर चाल 
कैसे है लोग चोर को  देते भेंट 

बलि इंसान की कह कर भोग देते 
किस परिंदे की औकात में है यह दुनिया सारी

सुनसान सी बस्ती और गरीबी में चमकती शहर सारी 
कल की मैयत पे खुश कुछ लोग बहुत थे 

आंसू शिष्टाचार की जाम बना अपनों के नाम पर सौत थे 
 खोट थे अब तो सोने के सिक्को में भी खैर 

पहुँच थी सरकार  से इसलिए वो खड़ा था 
सड़ा था उसका राज ,राजी उसके लोग थे। 

काली सी परछाई उसकी 
प्रजा कैसे बचती सब वहाँ  मौजूद थे 

खौफ को सौंफ की तरह बेच दी इस सिस्टम ने 
चारे तक बचे नहीं घोटालो में, गैर कोई सितम नहीं 

बचा नहीं इन्सां तो जानवर कैसे चलते बोलो 
रो दिए कैंडल जला ,निकाल के मार्च रोड पे 

न्याय कहा होंगी पैसो के महल में 
पहल कर दे कोई मौत उसके बगल में 

घुमा न कोई देश 
पर देखे सैकड़ो भेष 

हैश ट्रिगर आया है वो भी जल्दी जायगा 
डेली सोप जैसा रोज का न्यूज़ रुलाएगा 

लड़ेंगे कमेंट पर सामने कोई न आएगा 
डिजिटल की खुमारी में 

क्रांति की सुपारी कौन अब लाएगा 
घुमा न कोई देश 
पर देखे सैकड़ो भेष। 










by -vinny 

विचारों की समाधि - Sepulture of Thoughts

     मैं  एक विचारधारा हु ,, 
  मैं  लोगो को तय करता हु लोगो के सफलता से लेकर उनकी असफलता तक ,उनके समृद्द से लेकर तबाही तक ,  जो उनके पीछे होता है वह मैं  हूँ। .. मेरे ही द्वारा लोगो अपनों व दुसरो के प्रति अवधारणाएं बनाते है ,, कभी मैं  बार बार बनता हु बार बार बिगड़ता हु ,तो कभी सिमित तो कभी ऊँची दर्जे में पहुंच जाता हु।  और ऐसा बहुत काम होता है जहा मैं  निश्चित तौर पर किसी एक मत पर टिका रहुँ  .,


ज्यादातर तो मैं  स्तिथितियों पर ही निर्भर रहता हु मनुष्य के दिमाग में मेरा आना किसी स्तिथितियों की ही देन  है।

मुझे उजागर करने की तरीके भी जमाने के साथ बदल गए जहा पहले मैं  कही शांत ढेलो में था तो कहीं नियम  धर्म  के चपेडो में ,अब धीरे धीरे मैंने कई बदलाव देखे ,क्रांति ,उदासी ,जबर्दस्स्त  खुशी ,ये सब मेरे ही द्वारा उत्पन्न होती है या कहो मुझसे ही पैदा होती है।  मई अब आधुनिक हुआ जा रहा हु  ,,, अख़बार ,टेलीविज़न। सोशल मीडिया। पर मुझे कई प्रकार से दिखाया ,पढ़ाया ,सुनाया जाता है ,यहाँ पर भी मै लोगो में हर सेकंड बदलता रहता हु किसी किसी व्यक्ति में।  

आखिर क्यों हमें विचारों को भी शिक्षित करने की जरुरत है








मै सिर्फ तब तक ही लम्बे समय तक चलता हु जब मैं परीस्थ्तियोँ में अपनाया जाता हुँ।  और आज भी जो पुराने मत वाले विचार आपको कही देखने को मिलेंगे तो वह भी किसी परम्परा , समाज ,कठोर रंज ,आपसी समझ या फिर ,खुले दिमाग की वजह से। वैसे तो मेरे कई प्रकार है पर जो सबसे ज्यादा मायने रखती है वो है सिर्फ दो ही चीजे , कहने को बहुत छोटी चीज हु मैं  , मुझ पर सही तरीके की चुनाव और मुझ पर जीत करना जितना आसान है उतना कठिन भी  ,

मैंने ( विचार ) खुद को लोगो पर सिद्धः करते हुए भी देखा है ,,,. लोग ऐसा करके काफी लम्बे समय की खुशनुमा अहसास करते है।  बुरी तरह से भर कर लोग मुझे खुद पर भी बुरा असर डालते है।  

जहा मैं  शांत हु अच्छा हु सीधा और साफ़ हु वह मैंने खुशियां , शांति ,अच्छी माहौल ,सकारात्मक देखी  है मैंने बुरी विचारो की वजह से माहौल में ईर्ष्या ,दुःख,जलन ,नकारात्मक , संकी ऊर्जा भी देखा है।  

ऐसा कभी जरुरी नहीं था की मेरे अच्छाई सुखद सुद्ध विचार हर बार सफल हो ,ये काम पूरी करने की ताकत जरूर रखते है ,पर  कुछ में मैं  ऊपरी परत की तरह हु तो कुछ व्यक्ति में मैं एक गहराई में दफ़न हूँ। 

और कुछ के पास ऐसे भी हूँ की कोई अंतर ही नहीं है , सुनकर मुझे आप स्पष्ट भी हो सकते है या दुविधा में ,खुसी में ,दुःख में भी जा सकते है।  





अंत में मैं  यही ब्यक्त करूंगा की -
मेरी समाधि की बेहतरीन पृष्ठ  वही मिलेगी जिसके पास से आपने मुझे सही तरह से सुना होगा जो होता तो बहुत कम है ,या फिर उनके पास जिसने बिना मुझे सुनाये सामने उदहारण पेश किया हो।  



रिश्ते - नाते

रिश्ते ,,, एक बहुत ही खूबसूरत डोर लोगो से लोगो के बीच ,रिश्ते जो सहज ही अपने आप बन जाते है ,और या हम जो खुद बनाते है , रिश्ते जहा लोग सुरक्षित ,अपनापन ,महसूस करते है , एक दूसरे की परवाह , करते है ,प्यार से सींचते है ,मदद करते है ,प्रोत्साहित  करते है , सुझाव ,समझाइश और हर वक़्त पर हमारे साथ होते है। 
क्या यह नहीं है ,यही वह चीज है जो हमें और हम इंसानो को उच्च श्रेणी में रखती है ,

 कोई अहसास जो हमें जोड़ कर रखता है ,किसी अन्य को हमसे ,व हमें किसी अन्य व्यक्ति से या किसी वस्तु से ,
इंसानी दिमाग के  एक ऐसा भाव ,ख्याल , विचार , वह जोड़े रखता है हर छोटी बातो को , एक रिश्ता सा बन जाता है , ग्राहक का दुकानदार से ,शिक्षक का बच्चो से ,बेटी -पिता ,माँ ,परिवार,दोस्त।धीरे धीरे एक परिवार की तरह ही सब सिमट जाते है ,इंसानी स्वाभाव कितना भी चाहे वह अपनी हर वक्त के भावनाओ को रोक नहीं सकता 🎔,,, ऐसे में  स्थितियों को दोष देना कहा तक सही होगा , जब छोटी बातो पर रिश्ते तोड़ दिए जाते है , 

हमारे इतिहास ने यही सिखाया है ,धर्मं ग्रन्थ 📘📙📗 से हमारी उपज नहीं हुई है ये तो महज एक जरिया है खुद को किसी तरीके से याद रखना या खुद की आस्तित्व को सम्हाले रखना।✋ 
Image Source- Creativefabrica.in


जो था जो है सभी चीजों की शुरुआत तो इंसानो ने ही की है ,बात चाहे किसी भी चीज की  में है , .जानवरो ने कभी ग्रन्थ नहीं पढ़े नाह धर्म ,क्या  आपने देखा है कुत्ते भी अपने बच्चो को लेकर कितनी सचेत रहती है , 😍 बंदरो के समुदाय में भी यह देखा गया है किसी एक के मरने पर वो विलाप करते है , रिश्ते की देखभाल  और उन्हें सहेजते है , 

Image Source- Greenplanet.in



Image source - Medium.com

 बस उनमे जुमलों की दिखावा या  मतलब नजर नहीं आता , .ये तो सिर्फ अमूमन हम मानव जाति  में होता है ,,😟
यहाँ तो आज फायदे में रिश्ते बन रहे ,भावनाये जैसे चीजे नाम मात्रा रह गयी ,,बहुत कम हो गए वो लोग जो भावनाओ में  जीते थे शायद वो खुश रहते थे ,😊


रिश्तो में जंग लग जाना 😲,खोट आना सब बेबुनियाद कहावत है ,हमने अपने कोशिश को कभी शायद इतना मजबूत नहीं बनाया 😑 अपने स्वार्थ के बलभुते  कहावते लिख ली कमी छुपाने को। ..,,,,,,,,,


इन सबका सार सिर्फ रिश्तो और मानव के स्वाभाव को समझने के लिए कुछ चंद शब्दों के साथ किया  गया है , 💝
हो सकता है यह विचार सोचने पर मजबूर करे ,यह इस पुरे लेख की कोशिश रहेगी ,की दौड़ते जमाने में आप किस रिश्ते में उलझे है या सुलझ रहे है।  आपकी खुशियां किस ओर है। 🖐️ 







वक़्त



वक़्त वक़्त की बात है कुछ के अच्छे हालत है 
कोई अब भी लगाए आस है 
किसी ने उठाया बखूबी वक़्त का फायदा 
तो मारी  कुछ ने इसे लात है 

🎔🎔🎔

फंसे है सब इस वक़्त के ही जंजाल में 
बहुतो को इसकी बरसो से तलाश है 

🎔🎔🎔

क्या इतिहास क्या भविष्य कौन बन जाए कब ख़ास 
कौन बन रहे रोज़ ख़ाक यही सबकी हिसाब है 

🎔🎔🎔

इंतजार भी है और पीछा भी छुड़वाना  है 
कैसे है अदब और इसी में जी जाना है 
बदल जाते है लोग जब वक़्त अच्छा हो 
बदलते तो लोग तब भी है जब वक़्त बुरा हो 
ये फितरत है जिसे विधान कहा गया है 

दोष पूरा वक़्त को देना सबका बहाना है। 

🎔🎔🎔




- Vinny 

बगावत - पहचान या सजा ..





बगावत -
          बगावत और बगावती जैसे अंदाज़ से महरूम था मै  , मेरा नाम इस लफ़ज़ का ऐसा साथी था जो बिना किसी एक के बगैर अधूरा था। 
 इससे सब वाकिफ थे ,पहचान तो यही रह गयी थी , वैसे यह कोई बदलाव नहीं था जो हुआ धीरे धीरे हुआ बढ़ती उम्र ,खौलता खून ,बेबाक अंदाज़ ,जिद्द जोश नए उमंग और हर समय किसी नए की तलाश जैसे मुझे और ऊर्जा से भर देती थी , मेरी जिज्ञासा ख़त्म ही नहीं होती थी ,और उस पर नमक का काम करती थी बचपना और बचकानी हरकत  ,, यह तो मेरी बात रह गयी थी ,खैर लोग और लोगो की नजरे उस समय जो जबरदस्ती थोपे लगाती थी वो तो उसी समय तक ही रहा ,जहाँ हमें सोचने पर मजबूर किया जाता था की लोग क्या सोचेंगे ? 

                                                             शुक्र है समय बदलता है , बदलाव लाता है और मेरे लिए  अच्छा था ,उम्र का पड़ाव कहा तक ठहरता ,और रोकता मुझे भी ,मेरी जिद्द पर लोग उंगलियां उठाते चले गए और मै अपने ही सनक पर ठहरता गया जैसे नवजीवन की कोई शैतान बच्चे की तरह , जिसे सहारा मिला तो मेरे ही बगावती अंदाज़ का ,किसे पता था ये बाग़ी आँखे कभी गुलाबी भी होंगी और मैं कभी नौवे आसमान का सफर  रंगीन तितलियों के साथ करूँगा।  कभी  खुद को अकेले ही अपने हथेली से  सम्हालने वाला लड़का ,  आज किसी सुर्ख छुअन में शुकुन ढूंढ लेगा किसी शांत आँखों में एक किनारा देख लेगा ,

नीरा से पहली मुलाकात मुझे आज भी याद है मै  पहली ही बार में उससे कोई और किसि  प्रकार का आकर्षण मेहसुस नहीं किया ,,पर नीरा का मुझसे यूँ नजर मिलाने की कोशिश से मै  धीमे से प्रभावित हो रहा था , वो असर तो था जिससे मै मेहफ़ूज़ नहीं हो पाया ,

पहली बार अपने घर से दूर अपने दोस्तों के साथ हम सभी अपने कॉलेज के साइड से ट्रेनिंग लेने आये थे एक साल के लिए ये ट्रेनिंग में मै सीनियर था और मुझे दो तीन दिन के बाद ही वापस घर निकलना था क्यूंकि मै जूनियर के साथ आया था , टेढ़ी नाक भूरे बाल और लाल गाल जो मुझे उतना भी पसंद नहीं था  , नीरा भी सीनियर थी ,, जो मुझे हेड ऑफिस में पता चला ,, हमारे बिच उन  दो दिनों में थोड़ी  ही बात हुई ,हमारे नजरो का टकराना सिर्फ हम तक ही नहीं था वहाँ सबको इसकी खबर हो रही थी , वो दिन आया जब मुझे वापिस घर जाना था , मैंने यहाँ वहाँ से दोस्तों से बात करके मैनेजमेन्ट की फाइल से उसकी फ़ोन नंबर निकाल ली। . इस आकर्षण में मै  जहां बह  रहा था मुझे उसका पता था , मै  अपने जज्बातो से भी बखूबी पहचान रखता था और यही बात बहुत जल्दी मुझे ही ठगने वाली थी ,मै  घर आ चूका था  मैसेज के जरिये सिर्फ बात ही नहीं और भी चीजे बढ़ रही थी बराबर दोनों तरफ आग लगी थी , , और उससे मिलने की जिद्द रोके नहीं रोक पता था , पहली बार ही तो हुआ था ऐसा कोई जिंदादिल परवान चढ़ने को था जैसे , 

हम मिलने लगे उसके शहर में ,, जो शुरुआत में छोटी छोटी  बॅंक और छुट्टियां  मारता था अब वह  अपनी नौकरी घर छोड़ अपनों से  झगड़ कर  उसके शहर में बसने चला गया , वजह नीरा ही तो थी , जो बिंदास बाग़ी जिंदगी थी वहाँ हसीं रातें आने लगी , और ये भी तो ऐब ही थी हम इंसानो की हम खुशियों पर फुलस्टॉप कहा लगाना जानते है ,बस उस ओर  हर दिन बढ़ते  आगे बढ़ जाते है , और छोटी छोटी दुखद सवालियां चिन्ह छोड़  जाते है 

 वो उसकी बातें उसके साथ हर वक़त बिताना मै इन्हे अब अपने भविष्य में सजा रहा था , उसके साथ को तरसता ,उसकी तीखी व्यहवार जैसे  मुझे मारने  लिए अब काफी थी , मुहब्बत नीरा के साथ और नजदीकियां इतनी बढ़ गयी थी उसे खोने के  डर  से ही कंपन होती सांसे और मुरझाती आँखे बस ,,
 मेरे जिद्द में अब नीरा भी शामिल हो चुकी थी जिसकी खबर तक नहीं थी उसे , नाह मुझे।  नीरा के साथ मै  कब बदला और बदलने को तैयार भी हुआ पता ही नहीं चला ,थोड़े से भी ज्यादा वक़्त बिता लिया था हमने साथ में शायद पर 8  साल कितना कम  और कितना ज्यादा होता है ? वो  शहर  में अपनी पढाई और ट्रेनिंग पुरे होते ही घर चले गयी , अब उससे दुरी को खुद समझाना मेरे लिए दिनों दिन मुश्किल होता जा रहा था हसींन रातो ने अब बहस बैचेनी का रूप ले रही थी , कुछ था जो मेरा समझना बहुत जरुरी था , उसका रूखापन मुझे कही भी रहने पर भी सिर्फ नीरा की तरफ खींचते हुए ले जाता था , 

मैंने तय किया अपनी बैचेनी को थामने का , उससे कई सवाल किये ऐसे सवाल जिसके जवाब मै जानता था और इसी उम्मीद में वो यहां खरी नहीं उतर पायी ,

एक हामी भर कर  मै  घर लौट आया फिरसे सब छोड़  कर ,टुटा हुआ और उस टूटने की आवाज को दबाते हुए कदम रखे ,की कहीं अगर एक आंसू छलकेगी और जो कभी रोता  नहीं था वो इंसान आज ख़त्म हो जायगा ,कुछ दिन बीते  , नीरा की हसीं ,उसकी बातें हर वक़त  निचोड़ रही थी। मैं  रोक नहीं पाता  था नाह उसके चेहरे को आँखों में लाने से ना उसकी यादो को मन से भगाने में , कभी खुद पर सवाल उठाता तो कभी खुद के होने पर ,अपने अंदर के अम्बार को ऐसे तैसे बहन और माँ के नजरो से बचाता फिरता  कभी इस कमरे से कभी उस कमरे तक चलते हुए बार बार मुँह धोते ,पानी पि पि कर ,एक धुंद की नाकाम कोशिश नाह महक पाने की कब तक चलती यूँ ही , 
एक दिन माँ ने धीरे से मेरे पास आकर पूछा - बेटा  कुछ हुआ है क्या ? 

मेरी आँखे अगर उस वक़त तुरंत उठती तो माँ  पढ़ लेती और अपने इस जवान जोशीले बेटे की नम आँखे ,खुद को इतना कमजोर  मै  कैसे दिखाता  ? 
उठ कर जाने लगी माँ को मैंने पकड़ा और चीख चीख कर रोने लगा ,ये हिस्सा  देख कर बहन भी सहम पड़ी और पूछने लगी भइयाँ क्या हुआ ,, आंसू सब कह रहे थे बिना मेरे कुछ कहे ,मैंने भी जबान बंद रखी ,और मन ही मन में सोचने लगा मैंने कितनी दफे बगावत की थी नीरा के लिए हम दोनों के लिए।  और अब मै  तो बस  सिमटना चाहता था धीरे धीरे माँ के आँचल ने यह कह के मेरे आंसू सोंख लिए की तू सही था तेरी बगावत भी सही थी बस ये हो गया एक गलत के लिए ,जिसका खमियाज़ा यही होना था  शायद।  





























by-vicky