रायपुर में गर्मी की शुरुआत हो गयी है ,ये प्रतिदिन के दिनचर्या से अब थोड़ा गायब होने का दिन आ गया है , माँ ने कुछ दिनों के लिए घर बुलाये है और अब मुझे जल्दी तैयार होना था , बीजापुर जाते तक सुबह हो जाती थी , और शाम की ही बस लेनी थी मुझे , मुम्मा का फिर एक कॉल आया - निकल गए ? मैंने बोला नहीं मम्मी
मुम्म- हे भगवान् अभी नहीं है ,
और हमेशा की तरह मै फिर सोचता सिर्फ आवाज सुन के हाल का पता , वाह क्या कमाल है
ऐसे तैसे - आवाज में थोड़ी जोर लगाई और धीमे ही कहा की - हाँ बस रेडी होक निकलना है अभी
3 तो बज ही गए थे , तुरंत बैग पैक किये नहाये खाये और अपने हॉस्टल के पास के ही बस स्टॉप पे चला गया ,
क्यूंकि यह हाईवे में था , बस के आने तक का वेट और गर्मी , यहां ठंडी के खत्म होने का ज्यादा इंतज़ार नहीं करते लोग , इधर फेब्रुअरी का दूसरा हफ्ता लगता और नारियल पानी , गन्ने जूस,लस्सी,छाछ ,आइसक्रीम एक ही जगह पर दर्जन भर दिख जाते है , एक गन्ने के जूस का ग्लास मैंने लिया , टापरी के पास जाने ही लगा की बस आगयी। शुक्र है सीट मिल गयी कंडक्टर के पास ही , और सामने लडकियां जो कंडक्टर के साथ काफी बातें कर रही थी , अब फ़ोन भी नहीं निकाल सकता था , गाने सुन ने के लिए ना फेसबुक व्हाट्सप्प चलाने के लिए , जिंदगी में बहुत पाप किये पर अपने ट्रेवल को फ़ोन के स्टोरी में समेटा , क्या पता था पुरे सफर की भी एक स्टोरी बन जानी है , 12 घंटे के सफर में घर पहुंचते तक चार्ज भी तो बचानी है , बस भी चलने लगी एक ही ऑप्शन था वो यह की धूल में धुंद नजारो में नजर डाला जाए इतने में ही ,एक दो पहिये वाले हट्टे नवयुवक ने अपने शब्दों के बाण से कंडक्टर को चिल्लाने लगा , सवारी बैठाने के लिए ड्राइवर ने बस रोके थे और हॉर्न भी मारे
उसी समय इस नवयुवक की गाडी थोड़ी ज्यादा नजदीक हो गयी , जिससे उसके गाडी और उसके ड्राइविंग कुशलता थोड़ी झिझक गयी , गुस्से में चिल्ला चिल्ला के गाडी रुकवाने को इतने बार बोले की सब पैसेंजर का ध्यान ही उसमे था , थोड़ी देर के लिए सब सन्नाटे में , शायद ये सन्नाट थोड़े देर के लिए नहीं था , ड्राइवर ने गाडी रोकी , और वो जवान युवक अपनी गाडी साइड में लगा के ड्राइवर की दरवाजे खोल के उसके कॉलर पकड़ के गुस्से में चिल्लाने लगा ,
कैसा गाडी चालाता है ,
साले मार डालेगा क्या ?
खड़े खड़े खरीद लूंगा तेरी बस
हॉर्न नहीं बजती क्या तेरे गाडी में ?
ड्राइवर ने कहा- हॉर्न दिया था आप सुने नहीं ,
वो फिर चिल्लाने लगा - निचे आ हरामखोर चल तेरा कम्प्लेन कराता हुन्न बाप का सड़क है ?
कंडक्टर ने बिच बचाव किये और बोले - भैया जाने दो , वो हॉर्न बजाया था कॉलर छोड़ो और ,
ऐसे तैसे गहमा गहमी हुई उसने माफ़ी मांगने को कहा , ड्राइवर ने सॉरी कहा और धीमे धीमे गाडी फिर चालू करके निकल गए। ..
सब यात्रीगण शांत थे , ड्राइवर को अब उसके अपशब्द से शर्मिदा महसूस हुई , कोई गलती के लिए चिल्लाये तो बात ठीक भी है पर कोई नीचा दिखाए तो।
उन्होंने भी अपनी गाडी बढाई और आगे चलते बने , वो हमसे आगे ही चल रहा था , ड्राइवर ने कहा - होर्न दो तो सुनना नहीं है और गली गलौज करने आ जाते है , थोड़ी दूर एक और कंडक्टर बस में चढ़ा और शायद जो पहले था वो बिच में उतर गया , बस में कंडक्टर की जिंदगी भी अलग होती है आधे रास्ते में ही मंजिले बदलो , कभी आधे रास्ते में , कभी घरो के पास ,
खैर ड्राइवर की बात करते है
ड्राइवर अब गुस्से में था , उसने कहा यही दबा के चला जाऊंगा पता भी नहीं चलेगा ऐसा बोलके बस की स्पीड बढ़ा दी क्यूंकि वो नवयुवक तो जस्ट आगे ही था ,
इतने में ही ड्राइवर के पास वाले सीट में दो तीन अंकल ने उसे मनाये मत करो ऐसा , बढ़ी बुद्धि अम्मा ने भी बोले - छोड़ो ये सब हम सभी को अपने अपने घर जाना है , मत करो ऐसा
ड्राइवर ने सुन ली और बस ट्रैक में ले आये। मुश्किल से 5 मिनट हुई थी यात्री अपने खुसर फुसर में थोड़े व्यस्त हुए ही थे की अब कंडक्टर ने कहा गाडी रोक भाई - अभी बताता हुन्न गाली दे रहा है मेको ,
ड्राइवर ने बस रोकी , एक बड़ा पत्थर सामने सीट से निकाले और ,बस के चक्के के पीछे रख दिए , माहौल अब तो और गरम था , एक दो अंकल बस से उतरे और बस के पीछे समझौते करने गये , मैं तो इन सब चीजों का आदि नहीं था , हालाँकि शहर के ट्रैफिक ,छोटे दूकान से लेकर बड़े बड़े व्यापारी , यहां तो यह डेली के है , किसी से मार पिट कही गुस्सा हर दिन के वही चोचले ,ऐसे तो केस बहुत कम थे जिसमे टक्कर हुई ,तो झगड़े ना हो ,ना के बराबर ,
शहर में रह के आप मॉडर्न हो सकते है एक फेक शिष्टाचार बना सकते है , आमिर हो सकते है अपने सपनो की बुनियाद रख सकते है , पर इन सब के बीच ऐसे फसे रहते है की विनम्रता , नार्मल ये सब चीजे बस एक शब्द बन जाती है बस एक शब्द ,,,
अच्छा हुआ माहौल शांत हुआ मैं सोचने लगा सफर की शुरआत में डायलॉग्स डिलीवरी हुई , दो लोग को एक मिनट में करीब से मेरे साथ दूसरे यात्रियों ने भी देखा , बड़े बुजुर्ग ,अंकल आंटी ने फिर समझाया और अब निकल पड़े रायपुर से , आधे दूर तक बस झगडे की ही चर्चा चली जिसमे एक दो लोगो ने अपने अपने विचार रखते गये
फिर से कमाल हुआ , जब झगड़ा हुआ तब कोई सामने नहीं आया , पहले वाले झगड़े में किसी ने भी ड्राइवर की तरफ कुछ भी नहीं बोले ,
खैर एक दो घंटे में अब मैं धमतरी पहुंच जाऊंगा नींद तो आने से रही ,
मुझे सफर का मजा इसलिए भी आता है की आप जीतने ज्यादा सफर करते है इस एक सफर में कई अलग अलग लोगो को उनके लाइफ के एक हिस्से को देखने का मौका मिलता है ,
साल दर साल बहुत कुछ बदला , पहले यात्री को दुकान से जाके खाने पिने का सामान लेना पड़ता था पर अब दूकानदार या दूकान में काम करने वाले , सीधे बस में बैठे यात्री तक अपने सामान बेचने आ सकते है , इससे महिलाओ और बुजुर्ग को काफी फायदा हुआ , बस की टाइमिंग भी बस मिनटों तक रहती थी
यह एक टास्क की तरह चलता है ,
दस मिनट में पीछे महिंद्रा की गाडी आएगी और उस से पहले रॉयल को जाना पड़ेगा ,सँवारी को लेके बस वालो ने भी अपनी व्यस्था कर लिए है ,
कभी कभी इनके बिच भी टाइमिंग गड़बड़ी और हमारी सँवारी के झगड़े होते भी सुने है मैंने।
कहा था ना , सफर एक अनुभव अनेक। ..
अब चलते है चारामा की ओर , नींद अब भी नहीं आयी मुझे पर अब थोड़ी से फ़ोन की नोटिफिकेशन चेक कर सकता हूँ मैं
मम्मी के तीन मिस कॉल उनसे बात करके बता दिए ,चारामा पहुंचने वाला हूँ
अचानक बिच में झपकी खुली मेरी। एक फिर से जवान नवयुवक मेरी तरह एक अंकल को चिल्लाने लगा की हाथ कैसे लगाया तू ?
फिरसे। .. माहौल ???
क्या हो गया है इस देश को , कही गुस्सा कहीं धुंआ धुंआ ,
धीरे धीरे इनके बीच भी वाद विवाद होने लगे , एक दाम्पत्य जोड़े के साथ लड़ता हुआ एक युवक। कंडक्टर ने आके पूछे हुआ क्या ?
तो अंकल ने बोले - वाइफ को छेड़ रहा है हाथ हटाने बोला तो समझा नहीं , ऊपर से भड़क रहा है।
उस लड़के के आँखों से लगता था किसी नशे का आदि है ,यह बात कंडक्टर भी समझ गया और उसे दूसरे जगह बिठा दिए ,
अब लगा की सच में आज का सफर तो तय था इन लोगो के साथ
पर क्युँ ?
चारामा बस स्टैंड में बस अंदर जाती उससे पहले ही 4 लड़के जोश में बोलते बोलते बस में घुस कर कहने लगे -
कौन मारा भाई को ?
कौंन हाथ लगाया ?
और इसी समय उस अंकल की वाइफ ने उन्हें कवर कर लिए उनके आगे आगयी ,
अब कंडक्टर और बस ड्राइवर अपनी संपत्ति में में दुसरो के होशियारी कैसे देखते ,
ड्राइवर-ने बस रोकी बाकी यात्री जिन्हे उतरना था वो उतर गए
कंडक्टर और बस ड्राइवर ने सबको निचे उतारे ,उन्हें दो लाइन सारी बता दी की -तेरा दोस्त नशे में छेड़ रहा था ले जा नहीं तो सामने में है थाना ,
चारामा बस स्टैंड के सामने में ही थाना है जहां मैं भी कई बार गया हूँ इसकी कहानी कभी और ,,
लड़के शांत हो गए और गलती बिना माने चले गये
पीछे फिर खुसर फुसर में सुनाई दिए की
लड़का कॉल करके पहले से बुला लिआ था अपने दोस्तों को ,,,
जो भी हुआ उन सब में एक चीज जो सबको जोड़ती थी वो थी उम्र
बस ड्राइवर की उम्र ,रायपुर रोड में हट्टा कट्टा ,बस बेचने की औकात रखने वाला नवयुवक ,चारामा में अपनी यारी को आजमाता लड़को का ग्रुप , सब २० सी 28 उम्र के थे ,
और जो दूसरी है वो अब आम है - कुंठित मन और गुस्सा।

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