🎔🎔टैगोर जी के गीतांजलि लेख से कुछ चंद शब्द - 🎔🎔
रविंद्रनाथ टैगोर जो न ही सिर्फ एक लेखक थे बल्कि मशहूर दार्शनिक ,नाटककार ,संगीतकार भी थे ,
साहित्य जगत में उनका नाम विदेशो में भी फैला हुआ था , आइंस्टीन और टैगोर जी के वार्तालाप को 'Note on the nature of reality ' का नाम दिया गया ,
यही नहीं उनके लेख से बड़े बड़े नेता वैज्ञानिक भी अभिभूत हो उठते थे।
रबीन्द्रनाथ टैगोर जी ऐसे पहले नॉन-एसीएन थे जिन्हे साहित्य में नोबल प्राइज मिला , उन्होंने नोबल प्राइज के पैसो से शांतिनिकेतन स्कूल खोलवाये। उनकी तीन बेटियां व दो बेटे थे।
उनके लेख जीवन स्मृति और गीतांजलि हिंदी साहित्य के साथ बांग्ला में भी बहुत प्रचलित हुई ,
न ही सिर्फ हिंदी बल्कि उन्होंने तीन राष्ट्र गान भी लिखे व राष्ट के हित में सहयोग दिए।
टैगोर जी के ' गीतांजलि 'लेख से कुछ चंद शब्द-
1. '' मेरी ऋघा भारी है मेरी विफलता बड़ी है मेरी लज़्ज़ा गुप्त है और हृदय को दबाये देती है
तथापि जब मैं अपने कल्याण के लिए याचना करने आता हूँ तब मैं भय से कैंप उठता हूँ की कही मेरी प्रार्थना स्वीकार ना हो जाए "
2. ''अगर मैं अपनी प्रार्थना में तुझे नहीं पुकारता अगर अपने हृदय में तुझे धारण नहीं करता तब भी तेरा प्रेम मेरे प्रेम की प्रतीक्षा करता है ''
3. ''मेरे साथियों ने मेरी हंसी उड़ाई और घमंड से सर ऊँचा किये हुए तेजी से आगे बढ चले गए उन्होंने पीछे की ओर एक बार भी नहीं देखा और ना ही अभिवादन किया , थोड़ी देर में सुन्दर निल छाया में हपति से छिप गए , उन्होंने अनेक मैदानों और पहाड़ियों को पार किया और कितने ही बड़े बड़े देश उनके रास्ते निकल पड़े , वीर यात्रियों तुम धन्य हो ,
उपहास और निंदा ने मुझ में उठने का आग्रह किया परन्तु मेरे हृदय ने एक ना मणि मैंने अपने आपको रमणीय वृक्षों की छाया के तले आनंदमय अगाध आगौरव में निमग्न कर दिया।
4. '' मुझ में तुम्हे भरपूर आनंद आता है , इसलिए अपने ऊँचे शासन से तुम्हे नीचे उतरना पड़ा है , हे सर्वभुनेश्वर यदि मैं ना होता तो तेरा प्रेम कहा होता।
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टैगोर जी प्राकृतिक प्रेमी थे , यही नहीं अपनी पत्नी मृणालिनी को वो प्यार से मीनू कह कर पुकारते थे , एक लेखक होने के साथ साथ अति संवेदनशील होना हर मनुष्य की बात नहीं होती , रबीन्द्रनाथ टैगोर जी के लेख यह दर्शाते है की एक विचार किस हद तक आपको कई चीजों से रूबरू कराती है।
रविंद्रनाथ टैगोर जो न ही सिर्फ एक लेखक थे बल्कि मशहूर दार्शनिक ,नाटककार ,संगीतकार भी थे ,
साहित्य जगत में उनका नाम विदेशो में भी फैला हुआ था , आइंस्टीन और टैगोर जी के वार्तालाप को 'Note on the nature of reality ' का नाम दिया गया ,
यही नहीं उनके लेख से बड़े बड़े नेता वैज्ञानिक भी अभिभूत हो उठते थे।
रबीन्द्रनाथ टैगोर जी ऐसे पहले नॉन-एसीएन थे जिन्हे साहित्य में नोबल प्राइज मिला , उन्होंने नोबल प्राइज के पैसो से शांतिनिकेतन स्कूल खोलवाये। उनकी तीन बेटियां व दो बेटे थे।
उनके लेख जीवन स्मृति और गीतांजलि हिंदी साहित्य के साथ बांग्ला में भी बहुत प्रचलित हुई ,
न ही सिर्फ हिंदी बल्कि उन्होंने तीन राष्ट्र गान भी लिखे व राष्ट के हित में सहयोग दिए।
टैगोर जी के ' गीतांजलि 'लेख से कुछ चंद शब्द-
1. '' मेरी ऋघा भारी है मेरी विफलता बड़ी है मेरी लज़्ज़ा गुप्त है और हृदय को दबाये देती है
तथापि जब मैं अपने कल्याण के लिए याचना करने आता हूँ तब मैं भय से कैंप उठता हूँ की कही मेरी प्रार्थना स्वीकार ना हो जाए "
2. ''अगर मैं अपनी प्रार्थना में तुझे नहीं पुकारता अगर अपने हृदय में तुझे धारण नहीं करता तब भी तेरा प्रेम मेरे प्रेम की प्रतीक्षा करता है ''
3. ''मेरे साथियों ने मेरी हंसी उड़ाई और घमंड से सर ऊँचा किये हुए तेजी से आगे बढ चले गए उन्होंने पीछे की ओर एक बार भी नहीं देखा और ना ही अभिवादन किया , थोड़ी देर में सुन्दर निल छाया में हपति से छिप गए , उन्होंने अनेक मैदानों और पहाड़ियों को पार किया और कितने ही बड़े बड़े देश उनके रास्ते निकल पड़े , वीर यात्रियों तुम धन्य हो ,
उपहास और निंदा ने मुझ में उठने का आग्रह किया परन्तु मेरे हृदय ने एक ना मणि मैंने अपने आपको रमणीय वृक्षों की छाया के तले आनंदमय अगाध आगौरव में निमग्न कर दिया।
4. '' मुझ में तुम्हे भरपूर आनंद आता है , इसलिए अपने ऊँचे शासन से तुम्हे नीचे उतरना पड़ा है , हे सर्वभुनेश्वर यदि मैं ना होता तो तेरा प्रेम कहा होता।
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टैगोर जी प्राकृतिक प्रेमी थे , यही नहीं अपनी पत्नी मृणालिनी को वो प्यार से मीनू कह कर पुकारते थे , एक लेखक होने के साथ साथ अति संवेदनशील होना हर मनुष्य की बात नहीं होती , रबीन्द्रनाथ टैगोर जी के लेख यह दर्शाते है की एक विचार किस हद तक आपको कई चीजों से रूबरू कराती है।

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