Wednesday, May 27, 2020

दिन की पहली कमाई






   सब्जी बेचने का काम तो मुझसे शायद कभी नहीं हो पायेगा, ठंडी में चाय और समोसे, 
बारिश के मौसम में घर पे थोड़े दिन की जिंदगी बसर हो जाती थी. और अब नया सामान बेचना जैसे नए धंदे में घुसना। सीतारिन बाई से तो हमेशा से मेरी झड़प ही हुई बाजार  को लेकर मेरा ठेला उसकी छोटी सी चौपाई अब मैं ठहरा बाहरी राज्य का और सीतारिन काकी मंझी हुई व्यापारी उनसे दुश्मनी भी नहीं कर सकता और ये कोई भी नहीं करता पुरे बाजार में ऐसी औरत जिसकी स्वाभिमान की चर्चा अपने चने के भाव कभी कम नहीं किये भले ग्राहक आये ना आये और व्यापार का पहला उसूल तो उसने बखूबी तोड़ के खुद के व्यापार को इतना बड़ा किया। 
मेरा वापस ओडिशा जाने का प्रबंध आखिर हो गया था बहुत मुश्किल के बाद, कितनी दौड़ भाग के बाद  अपने बड़े भैया के पास  जमापूंजी भेजवायी, 
वो तेलंगाना में फसे थे , हालाँकि फसा कोई नहीं था सब जीवन बसर करने के अपने मजदूरी तरीके से यहाँ वंहा राज्य में गए थे।  बड़े भैया का ओडिशा जाना बहुत  जरुरी था क्यूंकि लॉक डाउन में उन्होंने  पहले ही सारे पैसे माँ को भेजवा दिए थे।  कुछ महीने तो निकल ही गए पर भैया का घर जाने का जिद्द मुझसे देखा ना गया, 

हालात सच में बहुत ख़राब थी 

उनके कुछ दोस्त के रिश्तेदार घर जाते वक़्त ही भूख  और गर्मी में मारे गए ,  एक दोस्त ने आत्महत्या कर ली.
 
मजदुर शब्द पहली बार इतनी महीनो तक अखबारों में छपा रहा पहले भुगतान को तरसता मजदुर या काम या फिर आत्महत्या करते मजदूर 

इस बार नया था "प्रवासी मजदूर "

2009 में भैया तेलंगाना चले गए उन्हें गोदाम में  मजदूरी की काम मिली थी। ओडिशा में आये भूकंप से पिताजी की अपनी दूकान धवस्त हो गयी खबरों में छपा रहा की सरकार बाढ़ पीड़ितों को पैसे मकान दिलवाएगी '
  इंस्युरेन्स होने के बाद भी दूकान के बदले की पैसे नहीं मिले कागज़ी काम में उससे ज्यादा पैसे लग गए थे 
बहन और छोटा भाई उस वक़्त महज़ 5 , 7 साल के थे।  पिताजी बैंक और मुआवजे की रकम के लिए दफ्तर घूमते घूमते अपनी आखरी सांस को गिन लिए। 

भैया ने तेलंगाना जाते ही घर की हालत संभाल ली  पर सोचा के अकेले जाने से भार सारा उन पर है छोटी बहन मिताली और चीकू को आगे तक पढ़ाया जा सकता है भले हम ना पढ़ पाए तो क्या इसी सोच ने मुझे भी पढ़ाई छोड़ कमाने पे मजबूर कर दिया 
 
2010 में मै अपने दोस्तों के साथ छत्तीसगढ़ आया 

शुरुआत बहुत अच्छी हुई बाजार में पूरा दिन बित जाता, एक साल फल की दूकान में काम करने के बाद मैंने खुद का काम शुरू किया , चाय की टपरी कॉलेज के पास फिर गर्मियों में तरबूज की दूकान।  


लॉक डाउन इस चरण में अब मेरी भी हिम्मत  जवाब देने को है , तीन महीने में जमापूंजी अब ख़तम ही हो गयी 
ख्याल आया की सीतारींन बाई से मिलते हुए घर चला जाऊ.

आज बाजार का समय बस सुबह 7 से दोपहर 3 बजे तक है . परसो के लिए एक ट्रक ड्राइवर से बात हो गयी ओडीशा जाने को. 
 ये क्या ऊर्जे से भरा तेज चेहरा आज उदास सा है 
मैंने जा के पूछा काकी का कर रही हो 
उसने धीरे से कहा - का करे, समय है ना पैसा घर का राशन ख़तम होने  को है 
सूना है तू घर जारा बड़ा तैयार है आज तो 
हां जी काकी माँ परेशान है और मेरा धंदा भी मंदा है 
तूने सूना क्या काकी तेरे लिए एक खबर लाया मैं 
सीतारींन बाई - सूना दे खबरीलाल 
सरकार ने कहा है लोकल वोकल जैसा कुछ जिसमे स्थायी व्यापारी लोगो के सामान को तरजीह देने को जनता से कहा है. 

काकी अपने टोकरी से चने और पुराने लगी (सामान और डालना ). 
कुछ कहने ही वाली थी की एक 
ग्राहक तेज तर्रार अपनी गाड़ी दौड़ाते आया और पूछा - दाई चने कैसे लगाये ?
काकी - 10 रुपया बाबू 
ग्राहक - 8 में दे दो 
काकी ने एक पैकेट निकाला और पैसे लेकर  थमा दिए । 
पैसे डब्बे पे डाल कर कहने लगी 
के बोल रहा था तू सरकार स्थायी व्यापारी ?
मैं गाँव से यहां सुबह से आयी हुई हूँ , चने विदेश से तो ना लाती 
मेरे ही खेत के है 

 मोल कम ना करती तो ये भी नसीब ना होता 
दूकान के 500 की प्रोटीन पावडर  सस्ती है 
मेरे खेत के चने काफी महंगे है।  
दूकान बंद होने को है अब पुलिस आती ही होगी 
ये आज के 8 रूपये ही मेरी पुरे दिन की पहली कमाई है। 













Monday, May 11, 2020

मंटो के वो विचार जो गहनता को दिखाते है - सआदत हसन मंटो



                        मंटो के वो विचार जो गहनता को दिखाते है 
                                                                                --- सआदत हसन मंटो 






सआदत हसन मंटो एक क्रांतिकारी लेखक के रूप में जाने जाते थे चाहे वो सामाजिक कुरीति को लेकर हो या आजादी के समय में होने वाले लड़ाईयो को लेकर ,,
सआदत हसन जी का जन्म पंजाब के लुधियाना में 11 मई 1912 को हुआ , वे एक मशहूर लेखक ,नाटककार थे
जिनकी मुख्य रूप से भाषा उर्दू थी ,
उनके कई लेखो के वजह से उन पर मुकदमा चलाया गया।
मंटो मेरे पसंदीदा लेखकों में से एक है , इनके लेख से इनके विचार का पता चलता है जिन्होंने हर कदम में हकीकत से रूबरू करके अपने लफ़ज़ को बगावती अंदाज़ दिए है ,
यह सच  भी है की बिना बगावत वा क्रांति के चीजे बदली नहीं जा सकती , उनके द्वारा लिखी गयी 'ठंडा गोस्त '
काफी बेहतरीन लेख में से है।

उनके विचार गहनता और वैचारिक रूप से बेहद संवेदनशील थे
उनके द्वारा कहे गए कुछ विचार आज भी लेखको व साहित्य में जिन्दा है ,



                1. 













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Wednesday, May 6, 2020

प्रेम पर भगवान बुद्ध के विचार

                 




भगवान् बुद्ध एक अध्यात्म गुरु थे , उनके विचार उपदेश से कई  लोगो के जीवन में बड़े बड़े बदलाव आये , उन्होंने जीवन ,जीवन की समस्याओ व समाज मनुष्य व्यवहार पर कई विचार व्यक्त किये व उपदेश दिए ,
वे  दुनिया में बहुत जगह घूमे दुनिया भर में अपने अध्यात्म ज्ञान से मनुष्यो के अन्धकार जीवन में ज्योति भरे ,
उन्हके कई उपदेशो में से कुछ चन्द शब्द प्रेम पर -


































टैगोर जी के गीतांजलि लेख से कुछ चंद शब्द -

                               🎔🎔टैगोर जी के गीतांजलि लेख से कुछ चंद शब्द - 🎔🎔





रविंद्रनाथ टैगोर जो न ही सिर्फ एक लेखक थे बल्कि मशहूर दार्शनिक ,नाटककार ,संगीतकार भी थे , 
साहित्य जगत में उनका नाम विदेशो में भी फैला हुआ था , आइंस्टीन और टैगोर जी के वार्तालाप को 'Note on the nature of reality ' का नाम दिया गया , 
 यही नहीं उनके लेख से बड़े बड़े नेता वैज्ञानिक भी अभिभूत  हो उठते थे।  
                                                           रबीन्द्रनाथ टैगोर जी ऐसे पहले नॉन-एसीएन थे जिन्हे साहित्य में नोबल प्राइज मिला , उन्होंने नोबल प्राइज के पैसो से शांतिनिकेतन स्कूल खोलवाये।  उनकी तीन बेटियां व दो बेटे थे। 
उनके लेख जीवन स्मृति और गीतांजलि हिंदी साहित्य के साथ बांग्ला में भी बहुत प्रचलित हुई , 
न ही सिर्फ हिंदी बल्कि उन्होंने तीन राष्ट्र गान  भी लिखे व राष्ट के हित में सहयोग दिए।  

टैगोर जी के ' गीतांजलि 'लेख से कुछ चंद शब्द- 

 1.             '' मेरी ऋघा भारी है मेरी विफलता बड़ी है मेरी लज़्ज़ा गुप्त है और हृदय को दबाये देती है 
तथापि जब मैं अपने कल्याण के लिए याचना करने आता हूँ तब मैं भय से कैंप उठता हूँ की कही मेरी प्रार्थना स्वीकार ना हो जाए "


2.             ''अगर मैं अपनी प्रार्थना में तुझे नहीं पुकारता अगर अपने हृदय में तुझे धारण नहीं करता तब भी तेरा प्रेम मेरे प्रेम की प्रतीक्षा करता है '' 


3.             ''मेरे साथियों ने मेरी हंसी उड़ाई और घमंड से सर ऊँचा किये हुए तेजी से आगे बढ चले गए उन्होंने पीछे की ओर एक बार भी नहीं देखा और ना ही अभिवादन किया , थोड़ी देर में सुन्दर निल छाया में हपति से छिप गए , उन्होंने अनेक मैदानों और पहाड़ियों को पार किया और कितने ही बड़े बड़े देश उनके रास्ते निकल पड़े , वीर यात्रियों तुम धन्य हो , 

                            उपहास और निंदा ने मुझ में उठने का आग्रह किया परन्तु मेरे हृदय ने एक ना मणि मैंने अपने आपको रमणीय वृक्षों की छाया के तले आनंदमय अगाध आगौरव में निमग्न कर दिया। 

4.              '' मुझ में तुम्हे भरपूर आनंद आता है , इसलिए अपने ऊँचे शासन से तुम्हे नीचे उतरना पड़ा है , हे सर्वभुनेश्वर यदि मैं ना होता तो तेरा प्रेम कहा होता।  

                                                                        🎔🎔

                                             टैगोर जी प्राकृतिक प्रेमी थे , यही नहीं अपनी पत्नी मृणालिनी को वो प्यार से मीनू कह कर पुकारते थे , एक लेखक होने के साथ साथ अति संवेदनशील होना हर मनुष्य की बात नहीं होती , रबीन्द्रनाथ टैगोर जी के लेख यह दर्शाते है की एक विचार किस हद तक आपको कई चीजों से  रूबरू कराती है।