सब्जी बेचने का काम तो मुझसे शायद कभी नहीं हो पायेगा, ठंडी में चाय और समोसे,
बारिश के मौसम में घर पे थोड़े दिन की जिंदगी बसर हो जाती थी. और अब नया सामान बेचना जैसे नए धंदे में घुसना। सीतारिन बाई से तो हमेशा से मेरी झड़प ही हुई बाजार को लेकर मेरा ठेला उसकी छोटी सी चौपाई अब मैं ठहरा बाहरी राज्य का और सीतारिन काकी मंझी हुई व्यापारी उनसे दुश्मनी भी नहीं कर सकता और ये कोई भी नहीं करता पुरे बाजार में ऐसी औरत जिसकी स्वाभिमान की चर्चा अपने चने के भाव कभी कम नहीं किये भले ग्राहक आये ना आये और व्यापार का पहला उसूल तो उसने बखूबी तोड़ के खुद के व्यापार को इतना बड़ा किया।
मेरा वापस ओडिशा जाने का प्रबंध आखिर हो गया था बहुत मुश्किल के बाद, कितनी दौड़ भाग के बाद अपने बड़े भैया के पास जमापूंजी भेजवायी,
वो तेलंगाना में फसे थे , हालाँकि फसा कोई नहीं था सब जीवन बसर करने के अपने मजदूरी तरीके से यहाँ वंहा राज्य में गए थे। बड़े भैया का ओडिशा जाना बहुत जरुरी था क्यूंकि लॉक डाउन में उन्होंने पहले ही सारे पैसे माँ को भेजवा दिए थे। कुछ महीने तो निकल ही गए पर भैया का घर जाने का जिद्द मुझसे देखा ना गया,
हालात सच में बहुत ख़राब थी
उनके कुछ दोस्त के रिश्तेदार घर जाते वक़्त ही भूख और गर्मी में मारे गए , एक दोस्त ने आत्महत्या कर ली.
मजदुर शब्द पहली बार इतनी महीनो तक अखबारों में छपा रहा पहले भुगतान को तरसता मजदुर या काम या फिर आत्महत्या करते मजदूर
इस बार नया था "प्रवासी मजदूर "
2009 में भैया तेलंगाना चले गए उन्हें गोदाम में मजदूरी की काम मिली थी। ओडिशा में आये भूकंप से पिताजी की अपनी दूकान धवस्त हो गयी खबरों में छपा रहा की सरकार बाढ़ पीड़ितों को पैसे मकान दिलवाएगी '
इंस्युरेन्स होने के बाद भी दूकान के बदले की पैसे नहीं मिले कागज़ी काम में उससे ज्यादा पैसे लग गए थे
बहन और छोटा भाई उस वक़्त महज़ 5 , 7 साल के थे। पिताजी बैंक और मुआवजे की रकम के लिए दफ्तर घूमते घूमते अपनी आखरी सांस को गिन लिए।
भैया ने तेलंगाना जाते ही घर की हालत संभाल ली पर सोचा के अकेले जाने से भार सारा उन पर है छोटी बहन मिताली और चीकू को आगे तक पढ़ाया जा सकता है भले हम ना पढ़ पाए तो क्या इसी सोच ने मुझे भी पढ़ाई छोड़ कमाने पे मजबूर कर दिया
2010 में मै अपने दोस्तों के साथ छत्तीसगढ़ आया
शुरुआत बहुत अच्छी हुई बाजार में पूरा दिन बित जाता, एक साल फल की दूकान में काम करने के बाद मैंने खुद का काम शुरू किया , चाय की टपरी कॉलेज के पास फिर गर्मियों में तरबूज की दूकान।
लॉक डाउन इस चरण में अब मेरी भी हिम्मत जवाब देने को है , तीन महीने में जमापूंजी अब ख़तम ही हो गयी
ख्याल आया की सीतारींन बाई से मिलते हुए घर चला जाऊ.
आज बाजार का समय बस सुबह 7 से दोपहर 3 बजे तक है . परसो के लिए एक ट्रक ड्राइवर से बात हो गयी ओडीशा जाने को.
ये क्या ऊर्जे से भरा तेज चेहरा आज उदास सा है
मैंने जा के पूछा काकी का कर रही हो
उसने धीरे से कहा - का करे, समय है ना पैसा घर का राशन ख़तम होने को है
सूना है तू घर जारा बड़ा तैयार है आज तो
हां जी काकी माँ परेशान है और मेरा धंदा भी मंदा है
तूने सूना क्या काकी तेरे लिए एक खबर लाया मैं
सीतारींन बाई - सूना दे खबरीलाल
सरकार ने कहा है लोकल वोकल जैसा कुछ जिसमे स्थायी व्यापारी लोगो के सामान को तरजीह देने को जनता से कहा है.
काकी अपने टोकरी से चने और पुराने लगी (सामान और डालना ).
कुछ कहने ही वाली थी की एक
ग्राहक तेज तर्रार अपनी गाड़ी दौड़ाते आया और पूछा - दाई चने कैसे लगाये ?
काकी - 10 रुपया बाबू
ग्राहक - 8 में दे दो
काकी ने एक पैकेट निकाला और पैसे लेकर थमा दिए ।
पैसे डब्बे पे डाल कर कहने लगी
के बोल रहा था तू सरकार स्थायी व्यापारी ?
मैं गाँव से यहां सुबह से आयी हुई हूँ , चने विदेश से तो ना लाती
मेरे ही खेत के है
मोल कम ना करती तो ये भी नसीब ना होता
दूकान के 500 की प्रोटीन पावडर सस्ती है
मेरे खेत के चने काफी महंगे है।
दूकान बंद होने को है अब पुलिस आती ही होगी
ये आज के 8 रूपये ही मेरी पुरे दिन की पहली कमाई है।






















